दरभंगा , मई 14 -- कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा के पूर्व संस्कृत प्राध्यापक एवं प्रधानाचार्य डॉ कामदेव झा ने गुरूवार कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी का सदा से सर्वोच्च सम्मान रहा है।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन द्वारा 'वैदिक वाङ्मय में नारी-विमर्श' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि डॉ कामदेव झा ने कहा कि पत्नी के बिना पुरुष यज्ञ का अधिकारी नहीं हो सकता तथा गृहिणी के बिना घर, परिवार नहीं बन सकता। "न अरि" अर्थात नारी पुरुष की शत्रु नहीं, बल्कि जीवन रूपी रथ के दो पहियों में से एक है, जिनमें संतुलन आवश्यक है।उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन, समृद्ध एवं गौरवशाली संस्कृति है, जिसमें नारी का सदा सम्मान रहा है। उन्होंने वैदिक ऋषिकाओं - घोषा, आपाला, लोपामुद्रा एवं सरस्वती का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्नी ही पति को पतन से बचाती है, इसलिए उसे अर्धांगिनी कहा गया है। उन्होंने कहा कि वैदिक काल में नारी विद्या, धन एवं शक्ति से संपन्न थीं तथा उन्हें अपने इच्छानुसार वर चयन का अधिकार प्राप्त था।

उद्घाटनकर्ता के रूप में सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा, मधुबनी के प्रधानाचार्य प्रो जीवानन्द झा उपस्थित रहे। प्रो जीवानन्द झा ने कहा कि वैदिक नारियाँ सर्वकालिक एवं सार्वदेशिक रूप से प्रासंगिक हैं। नारी सम्मान से ही परिवार, समाज एवं राष्ट्र उन्नति कर सकता है।

प्रो. विद्यानाथ झा ने मैत्रेयी एवं गार्गी जैसी विदुषी नारियों की दार्शनिक एवं आध्यात्मिक क्षमता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समाज को नारी को आगे बढ़ाने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए।

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