नयी दिल्ली , सितम्बर 21 -- उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने भारतीय चाय को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए शोध, आधुनिकीकरण, ब्रांडिंग और मूल्यवर्धन पर जोर दिया।
श्री राधाकृष्णन ने सोमवार को नीलगिरी के कूनूर में यूनाइटेड प्लांटर्स एसोसिएशन ऑफ साउदर्न इंडिया (यूपीएएसआई) टी रिसर्च फाउंडेशन के शताब्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि चाय क्षेत्र में लागत कम करने के और गुणवत्ता तथा उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ बदलती बाजार जरूरतों के अनुरूप काम करना जरूरी है। उपराष्ट्रपति ने फाउंडेशन के 100 वर्ष पूरे होने पर बधाई देते हुए चाय उद्योग, बागान मालिकों और श्रमिकों के लिए शोध और योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के बड़े चाय उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। चाय की खेती के साथ उसके कुशल प्रसंस्करण और विनिर्माण पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने चाय क्षेत्र में ऐसे शोध का विस्तार करने पर जोर दिया, जिससे लागत, गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार हो सके। उन्होंने कहा कि बागान मालिकों को गुणवत्ता बनाए रखने और बदलती बाजार जरूरतों के अनुरूप काम करने के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए। वैश्विक चाय बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को यह देखना होगा कि उसकी चाय का अधिक प्रभावी तरीके से विपणन कैसे किया जा सकता है, राजस्व कैसे बढ़ाया जा सकता है और बागान क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान कैसे किया जा सकता है।
उपराष्ट्रपति ने चाय उद्योग की जरूरतों का व्यवस्थित आकलन कर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ठोस परियोजना प्रस्ताव तैयार करने का आह्वान किया। उन्होंने शोध के लिए पेशेवरों की पहचान करने, चाय कारखानों के आधुनिकीकरण और जरूरी मरम्मत पर भी जोर दिया, ताकि भारतीय चाय का उत्पादन वैश्विक मानकों के अनुरूप हो सके।
श्री राधाकृष्णन ने चाय उत्पादकों और निर्यातकों से थोक चाय से आगे बढ़कर मजबूत भारतीय ब्रांड विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने कई देशों की यात्राओं के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विभिन्न देशों के चाय ब्रांड दिखाई देते हैं और भारतीय चाय ब्रांडों की मौजूदगी बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने हितधारकों से मजबूत ब्रांड के तहत भारतीय चाय के विपणन के लिए साथ आने का सुझाव दिया। इससे बाजार में स्थिति मजबूत करने के साथ राजस्व और कीमतों में सुधार में मदद मिल सकती है।
उन्होंने यूपीएएसआई से शताब्दी वर्ष का उपयोग स्थायी संस्थागत विरासत बनाने के लिए करने को कहा। उन्होंने अधिक स्थानों पर चाय अनुसंधान नेटवर्क के विस्तार और शोध केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उभरती चुनौतियों और अवसरों से निपटने के लिए शोध को लगातार बढाया जाना चाहिए।
बागान श्रमिकों की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने उनके कल्याण पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बतायी। उन्होंने कहा कि बागान श्रमिकों का कल्याण उद्योग के विकास और स्थिरता का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने कहा, ''उद्योग का कल्याण और श्रमिकों का कल्याण साथ-साथ चलना चाहिए।''उन्होंने चाय में मूल्यवर्धन के महत्व पर भी जोर दिया और प्रमुख हितधारकों से नये उत्पादों, प्रक्रियाओं और बाजार के अवसरों की पहचान के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत को बड़े चाय उत्पादक और उपभोक्ता देश होने का लाभ हासिल है और उद्योग को अपने बड़े घरेलू बाजार का अधिक उपयोग करना चाहिए।
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