नागपुर , अक्टूबर 20 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को विकास के एक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण का आह्वान किया और इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक विकास को पारिस्थितिकीय स्थिरता और नैतिक मूल्यों के साथ-साथ चलना चाहिए।

आरएसएस के विजयादशमी समारोह को संबोधित करते हुए श्री भागवत ने कहा कि एकतरफा विकास ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय अस्थिरता बढ़ायी है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति मानवीय जिंदगियों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका मूल समाधान एक ऐसे सतत विकास मॉडल को अपनाने में निहित है, जो सभी को साथ लेकर चले और उन लोगों को ही खतरे में न डाले, जिन्हें इससे लाभ पहुंचाया जाना है।

श्री भागवत ने जोर दिया, "अर्थव्यवस्था के साथ-साथ हमें पर्यावरण और नैतिकता पर भी विचार करना चाहिए तथा वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीक को इन तीनों बातों से तय की गई सीमाओं के भीतर ही आगे बढ़ना चाहिए।"परमाणु तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का जिक्र करते हुए उन्होंने आगाह किया कि नैतिक बाधाओं के बिना होने वाली तकनीकी प्रगति के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिसमें विनाशकारी हथियारों का प्रसार और फर्जी वीडियो बनाने तथा दुष्प्रचार फैलाने के लिए एआई का इस्तेमाल शामिल है।

उन्होंने हिंदू दृष्टिकोण को समावेशी बताया और कहा कि यह पूजा के किसी विशेष तरीके, खान-पान की आदतों, रीति-रिवाजों, भाषा, क्षेत्रीय पहचान या राजनीतिक विचारधारा को अनिवार्य नहीं बनाता है।

उन्होंने कहा, " सार्वभौमिक भाईचारा, आध्यात्मिकता और मानवता इसकी अनिवार्य विशेषताएं हैं।" उन्होंने कहा कि हिंदू लोकाचार में विभिन्न समुदायों की अलग पहचान को मिटाए बिना दुनिया को एकजुट करने की क्षमता है।

राष्ट्रीय एकता के विचार पर जोर देते हुए श्री भागवत ने कहा कि क्षेत्र, भाषा या पंथ की परवाह किए बिना सभी भारतीयों की पूर्वज जड़ें एक ही हैं। उन्होंने देश की सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा करने वाली महान हस्तियों के जीवन और बलिदानों से प्रेरणा लेने का भी आह्वान किया और कहा कि आधुनिक भारतीय जीवन को शाश्वत सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहते हुए समकालीन परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। भारत की जिम्मेदारी केवल आर्थिक और तकनीकी रूप से आगे बढ़ने की नहीं है, बल्कि दुनिया को विकास का नया रास्ता दिखाने की भी है।

श्री भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय एकता दिल में रची-बसी एक भावनात्मक बंधन है, न कि इस बात पर आधारित कोई अनुबंधात्मक रिश्ता कि देश अपने नागरिकों को क्या देता है। उन्होंने राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ भक्ति और सेवा की भावना की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा, "सवाल यह है कि हम भारत को क्या दे रहे हैं।"हिंदू लोकाचार को समावेशी बताते हुए श्री भागवत ने कहा कि यह विभिन्न समुदायों की गरिमा और सुरक्षा की रक्षा करते हुए सद्भावना, आपसी सम्मान और नैतिक आचरण को बढ़ावा देता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ये मूल्य भाषणों और विचारों तक सीमित रहने के बजाय आचरण में झलकने चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की अपार विविधता को देखते हुए, लोगों को देश की अंतर्निहित एकता को पहचानना चाहिए और अपने रोजमर्रा के मेल-मिलाप में आपसी सद्भावना का प्रदर्शन करना चाहिए।

समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करने वाले ऐतिहासिक संघर्षों का जिक्र करते हुए श्री भागवत ने मौजूदा मतभेदों को दूर करने, संदेहों को मिटाने और नयी गलतफहमियों को रोकने के लिए प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए आम नागरिकों, सरकार, प्रशासन और सामुदायिक नेताओं के धैर्य और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होती है। नीतियां लागू करने वालों या अभियान चलाने वालों को नागरिकों के प्रति सम्मानजनक और विचारशील दृष्टिकोण बनाए रखना चाहिए।

श्री भागवत ने आरोप लगाया कि कुछ लोग छोटी-छोटी बातों पर विवाद भड़काने की कोशिश करते हैं और बाद में ऐसे मामलों के लिए आरएसएस को दोषी ठहराते हैं। उन्होंने दावा किया कि इस संगठन का ऐसी गतिविधियों से कोई संबंध या समर्थन नहीं है, और इसके साथ ही यह भी कहा कि इसकी सामाजिक समरसता के प्रति प्रतिबद्धता पर संदेह पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, "संघ के काम की नींव शुद्ध और निस्वार्थ प्रेम है।"उन्होंने कहा कि यह स्नेह किसी खास व्यक्ति या समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि हर किसी तक फैला हुआ है। आरएसएसकी गतिविधियां उसके स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत, बलिदान, सेवा और समर्पण के बल पर संचालित होती हैं।

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