बिलासपुर , सितंबर 02 -- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भरण-पोषण से जुड़े मामलों में पक्षकारों की आय और संपत्ति के शपथ पत्र पर जिरह को निष्पक्ष सुनवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए कहा है कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वास्तविक आय के संबंध में सवाल पूछने का अवसर मिलना चाहिए। न्यायालय ने दुर्ग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पति को पत्नी के आय के स्रोतों और उसके शपथ पत्र के संबंध में जिरह करने से रोक दिया गया था।
न्यायाधीश नरेंद्र कुमार व्यास ने मामले की सुनवाई करते हुए बुधवार को कहा कि जब तक शपथ पत्र में दिए गए तथ्यों पर जिरह का अवसर नहीं दिया जाता, तब तक दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिल सकता। उच्च न्यायालय ने दुर्ग फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया है कि 11 सितंबर को निर्धारित सुनवाई में पति को पत्नी की ओर से पेश किए गए शपथ पत्र के संबंध में सवाल पूछने की अनुमति दी जाए।
मामले के अनुसार रायपुर निवासी महिला ने अपने पति के खिलाफ दुर्ग फैमिली कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। उच्चतम न्यायालय के 'रजनेश विरुद्ध नेहा' फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुरूप महिला ने अपनी संपत्ति और आय का विवरण देते हुए शपथ पत्र भी न्यायालय में दाखिल किया।
सुनवाई के दौरान पति के अधिवक्ता ने पत्नी से उसके शपथ पत्र और आय के स्रोतों को लेकर जिरह शुरू की। इस बीच दुर्ग फैमिली कोर्ट के द्वितीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने तीन अगस्त को आदेश पारित कर इस तरह के सवाल पूछने पर रोक लगा दी। पति ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि पत्नी की आय और शपथ पत्र से जुड़े सवाल पूछने की अनुमति नहीं मिलने से उसका पक्ष कमजोर होगा और यह निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत है।
उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के तीन अगस्त के आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि पति को पत्नी के शपथ पत्र पर जिरह करने का अवसर दिया जाए लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जाए कि सवालों की पुनरावृत्ति न हो और न्यायालय का समय अनावश्यक रूप से बर्बाद न किया जाए। अदालत ने 11 सितंबर को ही गवाही पूरी करने का प्रयास करने के निर्देश भी दिए हैं।
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार केवल पति तक सीमित नहीं है। पत्नी को भी पति की ओर से पेश किए गए आय संबंधी शपथ पत्र पर जिरह करने की पूरी छूट होगी, ताकि उसकी वास्तविक कमाई का पता लगाया जा सके।
न्यायालय ने कहा कि फैमिली कोर्ट को ऐसी कार्यप्रणाली नहीं अपनानी चाहिए, जिससे किसी पक्षकार के बचाव के कानूनी अधिकार प्रभावित हों। अदालतों को पक्षकारों को निष्पक्ष सुनवाई का पर्याप्त अवसर देने के साथ ही मामले को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने से रोकने के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्रार जनरल को आदेश की प्रति संबंधित फैमिली कोर्ट जज को तत्काल भेजने का निर्देश भी दिया है, ताकि भविष्य में सुनवाई के दौरान इस संबंध में आवश्यक सतर्कता बरती जा सके।
उल्लेखनीय है कि बीएनएसएस की धारा 144 में पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से संबंधित कानूनी प्रावधान किए गए हैं। नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद इस धारा ने पूर्व की दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 का स्थान लिया है। इसके तहत पर्याप्त साधन होने के बावजूद पत्नी, बच्चों या माता-पिता का भरण-पोषण नहीं करने वाले व्यक्ति को अदालत मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है।
इस प्रावधान के दायरे में स्वयं अपना खर्च उठाने में असमर्थ पत्नी, अवयस्क अथवा शारीरिक-मानसिक रूप से अक्षम बच्चे और वृद्ध माता-पिता आते हैं। मामले की सुनवाई लंबित रहने के दौरान अदालत अंतरिम भरण-पोषण और कानूनी खर्च के भुगतान का आदेश भी दे सकती है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित