अलवर , जुलाई 26 -- राजस्थान में छोटी काशी की तरह सजा अलवर शनिवार रात उस समय भक्ति, आस्था और उल्लास के रंग में पूरी तरह डूब गया, जब भगवान जगन्नाथ और माता जानकी का 171वां दिव्य विवाह महोत्सव पूरे वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ।
हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में हुए इस ऐतिहासिक वरमाला महोत्सव ने पूरे शहर को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया। पहली बार इस दिव्य आयोजन में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
रूपबास स्थित विशाल रूप हरि मंदिर प्रांगण में आयोजित विवाह महोत्सव में शाम से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। स्थिति यह रही कि महोत्सव स्थल पर पैर रखने तक की जगह नहीं बची। अलवर शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी हजारों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ और जानकी मैया के दिव्य मिलन के साक्षी बनने पहुंचे।
रात करीब साढ़े 11 बजे जब माता जानकी सुसज्जित रथ में विराजमान होकर विवाह स्थल पहुंचीं तो पूरा वातावरण "जय जगन्नाथ" के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा करके उनका स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों और शहनाई की मंगल ध्वनि के बीच पुलिस की ओर से सशस्त्र राइफलों से सलामी दी गई।
पूरे आयोजन के दौरान पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान जगन्नाथ और माता जानकी ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। जैसे ही वरमाला हुई, मंदिर परिसर घंटियों और घड़ियालों की गूंज से प्रतिध्वनित हो उठा। श्रद्धालु भाव-विभोर होकर भजन-कीर्तन में झूम उठे। वरमाला के बाद महाआरती हुई और फिर हजारों श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।
जगन्नाथ मंदिर के महंत राजेंद्र शर्मा ने बताया कि इस वर्ष भगवान के विवाह के लिए 15 विशेष वरमालाएं देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से आईं। इनमें एक छत्तीसगढ़, तीन पुष्कर, दो वृंदावन, दो दिल्ली से भेजी गईं, जबकि शेष अलवर के श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से तैयार करवाईं। सभी वरमालाएं भगवान को अर्पित की गईं।
उन्होंने बताया कि अलवर में वर्षों पुरानी धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ और माता जानकी के विवाह के बाद जिले में मानसून पूरी तरह सक्रिय हो जाता है। माना जाता है कि इंद्रदेव वर्षा का आशीर्वाद देते हैं और पूरा क्षेत्र सुख, समृद्धि और खुशहाली से भर जाता है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस दिव्य विवाह को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और समृद्धि के उत्सव के रूप में भी देखते हैं।
श्री शर्मा ने बताया कि 26 जुलाई को रूपबास में विदाई समारोह आयोजित होगा, जहां माता जानकी के पीहर पक्ष की ओर से उन्हें पारंपरिक विदाई और सौगातें दी जाएंगी। इसके बाद 27 जुलाई की रात आठ बजे भगवान जगन्नाथ अपनी विवाहिता जानकी मैया के साथ भव्य एवं शाही रथ में सवार होकर रूपवास से रवाना होंगे और 28 जुलाई की तड़के तीन बजे पुराना कटला स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर पहुंचेंगे, जहां उनकी अगवानी की जाएगी।
जिस रूपहरि मंदिर परिसर में यह विवाह महोत्सव आयोजित होता है, वहां सात दिनों तक विशाल मेला लगता है। देशभर से श्रद्धालु, साधु-संत और व्यापारी यहां पहुंचते हैं। धार्मिक आयोजनों, भजन संध्या, झांकियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से पूरा क्षेत्र देर रात तक गुलजार रहता है।
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