मुंबई , सितंबर 23 -- बॉम्बे उच्च न्यायालय ने त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों पर पटाखे फोड़ने पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश दिये हैं और इसके साथ ही महाराष्ट्र सरकार एवं पुलिस को जुलूसों और उत्सवों के दौरान शोर और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिये हैं।

न्यायाधीश गिरीश एस. कुलकर्णी और न्यायाधीश नीला के. गोखले की पीठ ने गणेशोत्सव और अन्य त्योहारों के दौरान लाउडस्पीकर, तेज़ आवाज़ वाले संगीत प्रणाली और पटाखों से होने वाले अत्यधिक शोर से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिये।

न्यायालय ने त्योहारों के जश्न के दौरान लेज़र लाइट, तेज़ रोशनी वाली लाइट (हाई-इंटेंसिटी ल्यूमेन लाइट) और बीम के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी और अधिकारियों को शोर की तय सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

पीठ ने कहा कि वायु प्रदूषण, ज़हरीले तत्वों और पैदल चलने वालों और वाहनों के लिए सड़कों पर दुर्घटना के जोखिम को देखते हुए सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों पर रोक लगाना ज़रूरी है।

न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों का इस्तेमाल एक ऐसा मामला है जिस पर और कड़े नियम लागू करने की ज़रूरत है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इन प्रतिबंधों का मकसद धार्मिक जुलूसों या त्योहारों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उत्सवों के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।उच्च न्यायालय ने जुलूस और त्योहारों के कार्यक्रमों के लिए इजाज़त मांगने वाले आयोजकों को निर्देश दिया कि वे कार्यक्रम स्थल और जुलूस के दौरान डेसिबल मापने वाले मीटर लगाएं जो साफ़ तौर पर दिखाई दें। ध्वनी प्रणाली में इंटरनल साउंड लिमिटर होना भी ज़रूरी है और आयोजकों को यह पक्का करना होगा कि शोर का लेवल तय सीमा से ज़्यादा न हो। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे शोर के लेवल की निगरानी और रिकॉर्डिंग करें और बिना मंज़ूरी वाले या गैर-कानूनी ध्वनि प्रणाली के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई करें। नियम तोड़ने पर दोषी उपकरण या यंत्र ज़ब्त किए जा सकते हैं।

न्यायालय ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे 'शोर प्रदूषण नियमों' के तहत मंज़ूरी देने की शर्त के तौर पर सिक्योरिटी डिपॉज़िट (सुरक्षा राशि) लेने पर विचार करें। समूहों या संगठनों से कम से कम एक लाख रुपये और व्यक्तियों से 50,000 रुपये की राशि जमा करायी जा सकती है। तय शोर सीमा का उल्लंघन होने पर यह राशि ज़ब्त की जा सकती है।

न्यायालय ने कहा कि आयोजकों को दी गयी मंज़ूरी को कार्यक्रम के लिए ज़िम्मेदार लोगों के नाम, पते और मोबाइल नंबर के साथ सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए, ताकि उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय की जा सके। पुलिस और नागरिक अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे जुलूस शुरू होने से पहले आयोजकों को उनकी कानूनी ज़िम्मेदारियों और तय डेसिबल लेवल बनाए रखने की ज़रूरत के बारे में जागरूक करें।

पीठ ने कहा कि जब एक ही इलाके में कई जुलूसों या कार्यक्रमों की मंज़ूरी दी जाये, तो अधिकारियों को शोर के कुल असर पर विचार करना चाहिए। कई कार्यक्रमों से होने वाले शोर के संयुक्त असर पर विचार किये बिना मंज़ूरी नहीं दी जानी चाहिए।

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिये कि त्योहारों के दौरान तुरंत लागू करने के लिए इस आदेश को पूरे महाराष्ट्र में संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया जाये।

पीठ ने कहा कि केवल त्योहार मनाए जाने की वजह से मौजूदा शोर प्रदूषण नियमों को निलंबित नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने के बजाय रोकथाम के लिए पहले से कदम उठाने पर ज़ोर दिया। सुनवाई के दौरान, न्यायालय ने नागपुर और सोलापुर जैसे शहरों में पुलिस अधिकारियों द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों का उल्लेख किया और सवाल किया कि पूरे महाराष्ट्र में इसी तरह के रोकथाम के उपाय एक समान रूप से क्यों लागू नहीं किए जा सकते।

न्यायालय ने कहा कि नियमों के उल्लंघन पर 'शोर प्रदूषण नियमों', 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम', 'विस्फोटक अधिनियम', 'भारतीय न्याय संहिता' और अन्य लागू कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है। उच्च न्यायालय ये निर्देश गणेशोत्सव के चल रहे जश्न के बीच आए हैं, जब पूरे महाराष्ट्र में बड़े जुलूस और सार्वजनिक सभाएं हो रही हैं।

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