बैतूल , जून 22 -- पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण अभियान को लेकर मध्य प्रदेश के बैतूल नगर पालिका की तैयारियों पर सवाल उठने लगे हैं। शहर के फिल्टर प्लांट परिसर में पौधारोपण के लिए खोदे गए गड्ढों को लेकर स्थानीय लोगों और जानकारों ने इसे महज औपचारिकता करार दिया है। आरोप है कि पौधों के बीच आवश्यक दूरी और तकनीकी मानकों की अनदेखी की जा रही है, जिससे पौधारोपण अभियान की सफलता पर संदेह पैदा हो गया है।

सोमवार को प्राप्त जानकारी के अनुसार नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा इस वर्ष नगर पालिका बैतूल को 500 पौधे लगाने का लक्ष्य दिया गया था। इसके लिए अभिनंदन सरोवर, क्रीड़ा परिसर और फिल्टर प्लांट परिसर का चयन किया गया। शुरुआती बारिश के दौरान दो स्थानों पर पौधारोपण किया जा चुका है, जबकि फिल्टर प्लांट परिसर में अभी केवल गड्ढे खोदकर तैयारी की गई है।

स्थल पर खोदे गए गड्ढों का निरीक्षण करने पर पाया गया कि अधिकांश गड्ढों की गहराई एक फीट से भी कम है। इसके अलावा कई गड्ढे एक-दूसरे से मात्र दो से तीन फुट की दूरी पर बनाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की दूरी बड़े वृक्षों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।

नगर पालिका द्वारा यहां आम, पीपल, जामुन और करंज जैसे पौधे लगाए जाने की योजना है। ये सभी वृक्ष भविष्य में बड़े आकार के हो जाते हैं और इनके समुचित विकास के लिए पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है। वन एवं उद्यानिकी क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार आम के पौधों के बीच सामान्यतः आठ से 10 मीटर, पीपल जैसे विशाल वृक्षों के लिए 5 से 8 मीटर तथा करंज के लिए 4 से 5 मीटर की दूरी रखी जानी चाहिए। घनी वनरोपण योजनाओं में भी पौधों के बीच कम से कम तीन गुणा तीन मीटर की दूरी का प्रावधान रहता है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यदि पौधों को इतनी कम दूरी पर लगाया गया तो वे न तो स्वाभाविक रूप से विकसित हो पाएंगे और न ही लंबे समय तक जीवित रह सकेंगे। उनका कहना है कि पौधारोपण अभियान का उद्देश्य केवल लक्ष्य पूर्ति और खर्च दर्शाना नहीं होना चाहिए, बल्कि पौधों के संरक्षण और दीर्घकालिक विकास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष भी फिल्टर प्लांट परिसर में बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए थे। हालांकि, स्थानीय नागरिकों का दावा है कि पर्याप्त देखरेख के अभाव में अधिकांश पौधे कुछ ही समय में नष्ट हो गए और वर्तमान में वहां लगाए गए पौधों के जीवित रहने के प्रमाण नहीं मिलते। ऐसे में इस वर्ष की तैयारियों ने एक बार फिर पौधारोपण अभियान की गुणवत्ता और प्रभावशीलता को लेकर बहस छेड़ दी है।

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