बैतूल , सितंबर 23 -- मध्य प्रदेश में विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि की उपलब्धता से जुड़ी समस्या के बीच बैतूल से एक नए मॉडल पर काम शुरू करने की तैयारी है। इसके तहत ऐसी सरकारी जमीन, जो राजस्व रिकॉर्ड में वन भूमि के रूप में दर्ज है लेकिन मौके पर वनस्पति कम है, उसके बदले चंबल क्षेत्र में उपयुक्त राजस्व भूमि वन विभाग को देने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।

चंबल की इस जमीन पर वनीकरण कर जंगल विकसित करने की योजना है। यह मॉडल फिलहाल बैतूल में उद्योगों के लिए जमीन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रस्तावित है। जिले में औद्योगिक इकाइयों के लिए करीब 1500 एकड़ जमीन की जरूरत बताई गई है। जिला उद्योग केंद्र के अनुसार चिन्हित जमीन का बड़ा हिस्सा वन भूमि में दर्ज है। करीब आठ से 10 बड़ी औद्योगिक इकाइयां जिले में लगभग 1200 करोड़ रुपये के निवेश की इच्छुक बताई गई हैं।

जिला उद्योग केंद्र के प्रबंधक धीरज मंडलेकर ने आज बताया कि उद्योगों के लिए करीब 1500 एकड़ जमीन चिन्हित की गई है। वन भूमि होने के कारण जमीन उपलब्ध कराने में दिक्कत आ रही है। इस संबंध में वन विभाग को प्रस्ताव देने की तैयारी है। परियोजना के लिए परिवेश पोर्टल पर भी आवेदन किया गया है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल ने बताया कि इस विषय पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और अधिकारियों के साथ करीब एक वर्ष से चर्चा चल रही है। अब बैतूल से प्रस्ताव तैयार कर आगे भेजने की दिशा में काम किया जा रहा है। उनका कहना है कि प्रदेश में ऐसी कई सरकारी जमीनें हैं, जो रिकॉर्ड में वन भूमि के रूप में दर्ज हैं, लेकिन वहां पेड़ों की संख्या कम है। ऐसी जमीन के बदले दूसरी उपयुक्त जमीन वन विभाग को देकर विकास और वनीकरण दोनों कार्य किए जा सकते हैं।

प्रस्ताव के तहत चंबल क्षेत्र की उपयुक्त राजस्व भूमि वन विभाग को दिए जाने का विचार है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में करीब 6.83 लाख हेक्टेयर बीहड़ क्षेत्र है, जिसमें चंबल और अन्य नदियों के आसपास करीब 1.82 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। हालांकि बीहड़ क्षेत्र में गहरी खाइयों और मिट्टी के कटाव की समस्या को देखते हुए वनीकरण के लिए जमीन का चयन उसकी स्थिति, पानी की उपलब्धता और पौधों के लंबे समय तक संरक्षण की संभावना के आधार पर करना होगा।

प्रस्ताव में कानूनी प्रक्रिया सबसे अहम होगी। किसी जमीन पर पेड़ कम होने या मौके पर जंगल दिखाई नहीं देने मात्र से उसका वन भूमि का कानूनी दर्जा समाप्त नहीं होता। वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के लिए निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक मंजूरियां लेनी होंगी। इसमें केंद्र सरकार की अनुमति भी आवश्यक हो सकती है।

उत्तर वन मंडल के डीएफओ नवीन गर्ग ने बताया कि अभी उनके पास इस संबंध में कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं आया है। फिलहाल मामला योजना और जमीन के चयन के स्तर पर है। उद्योग विभाग की ओर से प्रस्ताव आने के बाद वन विभाग उसे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार देखेगा। जरूरत पड़ने पर मामला संबंधित केंद्रीय स्तर की समिति के समक्ष भी जा सकता है।

मध्य प्रदेश में क्षतिपूरक वनीकरण के लिए बीहड़ और राजस्व भूमि के इस्तेमाल के उदाहरण पहले भी सामने आए हैं। भिंड जिले में वन मंजूरी से जुड़े मामलों में विभिन्न गांवों की जमीन को क्षतिपूरक वनीकरण के लिए चिन्हित किया गया है। हालांकि बैतूल की वन भूमि के बदले चंबल की जमीन देने का प्रस्ताव तभी आगे बढ़ सकेगा, जब जमीन की कानूनी स्थिति, वनीकरण की उपयुक्तता और सभी पर्यावरणीय एवं वैधानिक शर्तें पूरी होंगी।

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