बीरभूम , अप्रैल 04 -- भारतीय संविधान की मूल पांडुलिपि को अपने रंगों से सजाने वाले महान चित्रकार नंदलाल बोस के नाती और उनकी पत्नी का नाम पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।
आधुनिक भारतीय चित्रकला के अग्रदूत नंदलाल बोस के परिवार के साथ हुए इस घटनाक्रम से विवाद खड़ा हो गया है। गौरतलब है कि नंदलाल बोस को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अनुरोध पर संविधान को चित्रित करने का गौरव मिला था।
शांतिनिकेतन में रहने वाले बुजुर्ग दंपत्ति सुप्रबुद्ध सेन (88) और दीपा सेन (82) ने सभी आवश्यक दस्तावेज जमा करने के बावजूद नाम हटाये जाने पर गहरा आक्रोश और निराशा व्यक्त की है। नंदलाल बोस की छोटी पुत्री यमुना सेन के पुत्र सुप्रबुद्ध सेन का बचपन अपने नाना की ही गोद में बीता है। उन्होंने 1954 में विश्व भारती के पाठभवन से मैट्रिक और बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। वह दामोदर घाटी निगममें 32 वर्षों तक सेवा देने के बाद 1996 में सेवानिवृत्त हुए।
सुप्रबुद्ध सेन ने कहा, " सुनवाई के दौरान मैंने महान कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के बनाये पाठ भवन का प्रमाण पत्र और नागरिकता से जुड़े सभी दस्तावेज आयोग के अधिकारियों को सौंपे। बाद में अधिकारी मेरे घर भी आये, मैंने उन्हें सब कुछ उपलब्ध कराया, फिर भी मेरा, मेरी पत्नी और पिछले 52 वर्षों से मेरे साथ रह रहे चक्रधर नायक का नाम सूची से हटा दिया गया है। इसका कोई तर्क समझ नहीं आता।"उन्होंने दुखी होकर कहा कि अब वह वोट नहीं देंगे।"तृणमूल कांग्रेस ने 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के बाद उनके नाम हटाये जाने की कड़ी निंदा की है। पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पर लिखा कि जिस महान कलाकार ने भारत के संविधान को चित्रित किया, उनके ही पोते को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि नंदलाल बोस ने संविधान के पन्नों पर भगवान कृष्ण, अर्जुन, बुद्ध, सिंधु घाटी सभ्यता, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक छवियों को उकेरा था। इससे पहले भी नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का नाम भी इसी प्रक्रिया के तहत विवादों में आया था, हालांकि बाद में उनके दस्तावेज स्वीकार कर लिये गये थे।
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