वाराणसी , जून 26 -- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के चिकित्सक-वैज्ञानिकों ने आयुर्वेद आधारित विश्व का पहला प्रकाशित 'एन-ऑफ-1' नैदानिक परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया है।
इस अध्ययन में डिमेंशिया की शुरुआती अवस्था हल्के संज्ञानात्मक ह्रास (एमसीआई) से पीड़ित एक मरीज पर आयुर्वेदिक शास्त्रीय योग 'कल्याणक घृत' का लगभग 14 माह तक मूल्यांकन किया गया। इस अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय, चिकित्सा विज्ञान संस्थान के क्रिया शरीर विभाग के प्रो किशोर पटवर्धन ने बताया कि मॉर्डन मेडिसिन में एन-ऑफ-1 हुए हैं और होते रहते हैं। आयुर्वेद में एन-ऑफ-1 क्लिनिकल ट्रायल पहली बार किया गया हैं। एक ही मरीज पर कई महीनों तक अलग अलग तरीके से अध्ययन किया गया।
अध्ययन में स्मृति, सोचने-समझने की क्षमता, दैनिक कार्य करने की दक्षता तथा अवसाद के लक्षणों में सुधार के संकेत मिले। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि किसी भी आयुर्वेदिक औषधि का सेवन केवल प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह और निगरानी में ही किया जाना चाहिए।
कल्याणक घृत आयुर्वेद का बहु-औषधीय योग है, जिसमें हरड़, आंवला, बहेड़ा, देवदार, हल्दी, जटामांसी, अनार और चंदन सहित अनेक औषधीय द्रव्यों का घृत में संसाधन किया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार पारंपरिक समूह-आधारित नैदानिक परीक्षणों की तुलना में एन-ऑफ-1 परीक्षण व्यक्तिकेंद्रित चिकित्सा पद्धति के मूल्यांकन के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है। भविष्य में ऐसे कई परीक्षणों के सामूहिक विश्लेषण से आयुर्वेद के वैज्ञानिक साक्ष्यों को और मजबूत किया जा सकेगा।
यह अध्ययन बीएचयू के आयुर्वेद, चिकित्सा एवं विज्ञान संकायों के विशेषज्ञों के संयुक्त सहयोग से किया गया। शोध हाल ही में पारंपरिक चिकित्सा की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ एथ्नोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक आयुर्वेद संकाय के प्रो. किशोर पटवर्धन तथा सह-प्रमुख अन्वेषक चिकित्सा विज्ञान संस्थान के प्रो. शंख शुभ्र चक्रवर्ती हैं। शोध दल में स्वाति शर्मा और सांख्यिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. अरुण कौशिक भी शामिल रहे।
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