, May 9 -- अध्यक्षीय संबोधन में स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने कहा कि संस्कृत का ज्ञान सिर्फ कंप्यूटर के माध्यम से सहजता से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, तथापि यह संस्कृत को देश-विदेश में प्रचार-प्रसार का बड़ा माध्यम जरूर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज भी संस्कृत-ज्ञान की मूल आधारशिला गुरु-शिष्य परंपरा ही है। संस्कृत में शब्दों एवं वाक्यों का अर्थ अत्यंत स्पष्ट होता है, क्योंकि इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही बोला भी जाता है। इसके व्याकरणिक नियम कंप्यूटर को भाषाओं के सही अनुवाद में भी सहायता प्रदान करते हैं।
संगोष्ठी की संयोजिका डॉ. ममता स्नेही ने स्वागत करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा नियम प्रधान है, जिसे देववाणी के साथ ही वैज्ञानिक भाषा भी कहा जाता है। इसकी वाक्य रचना अत्यंत स्पष्ट एवं नियमवद्ध है। इसकी संरचनात्मक स्वतंत्रता कंप्यूटर प्रोसेसिंग में भी सहायक है। इसकी तार्किकता ने आधुनिक वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट किया है।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ मोना शर्मा ने कहा कि संस्कृत ज्ञान-विज्ञान, गणित, खगोल, आयुर्वेद, वास्तु-विज्ञान आदि की आधारशिला है, जिसकी वाक्य-रचना सरल एवं लचीली है। इसकी व्याकरणिक संरचना कंप्यूटर भाषा के लिए उपयुक्त मानी जाती है। आधुनिक युग में कंप्यूटर विज्ञान एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में संस्कृत की उपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। समापन राष्ट्रगान से हुआ।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित