पटना, मई 16 -- बिहार में सुहागिन महिलाओं का पर्व वट सावित्री व्रत आज श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया।

सुबह से ही राज्य के विभिन्न जिलों में वट वृक्षों के नीचे सुहागिन महिलाओं की भारी भीड़ देखने को मिली, जहां उन्होंने अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।

राजधानी पटना सहित गया, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर, सीतामढ़ी, पूर्णिया और अन्य जिलों में व्रत को लेकर विशेष उत्साह देखा गया। महिलाएं पारंपरिक परिधान में सोलह श्रृंगार कर वट वृक्षों के पास पहुंचीं और पूजा की तैयारी में सुबह से ही जुट गईं। भरणी व कृत्तिका नक्षत्र के युग्म संयोग में वट वृक्ष की पूजा के बाद के चारों ओर कच्चे सूत (धागे) से परिक्रमा करने के बाद उन्होंने स्कन्द पुराण के प्रभास खंड के सावित्री- सत्यवान की पौराणिक कथा का श्रवण किया और अखंड सौभाग्य की कामना की।

वट सावित्री व्रत में शनिवार को भीषण गर्मी और उमस को देखते हुए कई स्थानों पर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए गए। वट वृक्षों के पास बिजली से चलने वाले पंखे, अस्थायी टेंट, शेड और पेयजल की व्यवस्था की गई, जिससे महिलाओं को पूजा के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो। कई जगह स्वयंसेवी संगठनों ने ठंडा पानी और शरबत वितरण की भी व्यवस्था की, जिससे भीड़ में राहत बनी रही।

ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने बताया कि ब्रह्मवैवर्त्तपुराण व स्कन्द पुराण के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट सावित्री का व्रत, पूजा एवं परिक्रमा के बाद भक्तिपूर्वक सत्यवान-सावित्री की कथा का श्रवण से सुहागिनों को अखंड सुहाग, पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, वंश वृद्धि, दांपत्य जीवन में सुख-शांति तथा वैवाहिक जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं I वट की पूजनोपरांत अन्न, वस्त्र, ऋतुफल, मिष्ठान आदि का दान करने से सुख-समृद्धि, पारिवारिक शांति, गृहक्लेश तथा अदृश्य बाधाएं दूर होती हैं।

आचार्य राकेश झा ने कहा कि वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थायित्व और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस वृक्ष की पूजा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। धार्मिक दृष्टि से यह व्रत न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति और समर्पण को भी दर्शाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार,सावित्री ने अपने तप, समर्पण और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे, तभी से यह व्रत पति की दीर्घायु के प्रतीक रूप में मनाया जाता है।

बिहार के ग्रामीण इलाकों में इस पर्व की विशेष छटा देखने को मिलती है। गांवों में प्राचीन वट वृक्षों के नीचे सामूहिक पूजा का आयोजन किया गया, जहां महिलाएं समूह में एकत्र होकर पूजा करने के बाद कथा श्रवण की I शहरों में भी मंदिरों और पार्कों में वट वृक्षों के आसपास विशेष व्यवस्था की गई थी, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। सुबह से ही महिलाओं ने फल, फूल, मिठाई, धूप, दीप और पूजा सामग्री के साथ वट वृक्ष की पूजा की। इस दौरान वातावरण पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक बना रहा।

स्थानीय बाजारों में भी व्रत को लेकर काफी चहल-पहल देखी गई। पूजा सामग्री, फल, साड़ी और सोलह श्रृंगार के सामानों की बिक्री में वृद्धि दर्ज की गई। दुकानदारों के अनुसार वट सावित्री व्रत के अवसर पर हर वर्ष बाजारों में विशेष रौनक रहती है और इस बार भी अच्छी बिक्री देखने को मिली।

राज्य के विभिन्न हिस्सों में प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा और सुविधा के विशेष इंतजाम किए गए थे। कई स्थानों पर पुलिस बल की तैनाती की गई, जिससे भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न हो। साथ ही प्राथमिक चिकित्सा और पेयजल की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई।

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