, May 8 -- मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण कुमार कर्ण ने कहा कि गीतांजलि में प्रकृति और ईश्वर के बीच गहरे संबंध का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है। टैगोर के गीत अपनी सौंदर्य चेतना, बिम्बों और प्रतीकों के कारण विशिष्ट बन जाते हैं। उनके काव्य में भारतीय पौराणिक परंपरा और प्रकृति का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. पुनिता झा ने कहा कि गीतांजलि प्रेम के विविध रूपों की अनुपम अभिव्यक्ति है। इसमें मानवता, प्रकृति, ईश्वर, राष्ट्र, सौंदर्य और सत्य के प्रति प्रेम की व्यापक अनुभूति देखने को मिलती है। टैगोर की कविताएँ जीवन के सत्य, सुख और सौंदर्य को अत्यंत सहजता से अभिव्यक्त करती हैं।

डॉ. शांभवी ने कहा कि गीतांजलि केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा है। यह मनुष्य को अहंकार त्यागकर ईश्वर से एकाकार होने की प्रेरणा देती है। इसकी शांत, सौम्य और दार्शनिक शैली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

डॉ. संकेत कुमार झा ने कहा कि गीतांजलि ईश्वर की आराधना और स्तुति में रचे गए गीतों का अनुपम संकलन है। इसमें भारतीय वैष्णव काव्य परंपरा की गहरी छाप दिखाई देती है तथा इसके गीत रहस्यमय, शाश्वत और उदात्त भावों से परिपूर्ण हैं।

डॉ. तनिमा कुमारी ने कहा कि गीतांजलि में भावों और अभिव्यक्ति की अद्भुत विविधता देखने को मिलती है। टैगोर एक दार्शनिक, राष्ट्रचिंतक, साहित्यकार, संगीतकार और कलाकार थे, जिसकी स्पष्ट झलक इस कृति में दिखाई देती है। इसी रचना के लिए उन्हें वर्ष 1913 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

कार्यक्रम में पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. मंजू राय, पूर्व अंग्रेजी प्राध्यापक डॉ. अमरेन्द्र शर्मा, डॉ. आर्यिका पॉल, ज्योति कुमारी, उत्कर्ष उमंग, आर्यन कुमार, शेफाली मालाकार, रवि कुमार एवं साक्षी सहित अनेक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता निभाई। अतिथियों का स्वागत डॉ. शांभवी ने किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन शेफाली मालाकार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने किया।

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