, May 10 -- कार्यक्रम के दौरान एम्स पटना से आयोजित राष्ट्रव्यापी शुभारंभ समारोह का सीधा प्रसारण भी प्रतिभागियों को दिखाया गया, जिससे अभियान के राष्ट्रीय स्वरूप एवं उद्देश्य की व्यापक जानकारी मिली। मुख्य प्रशिक्षक के रूप में डॉ. ओम प्रकाश ने प्रशिक्षण का नेतृत्व किया। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य मानकों के अनुसार, जन्म लेने वाले लगभग 10 प्रतिशत नवजातों को प्रारंभिक श्वास सहायता की आवश्यकता पड़ सकती है, जबकि एक प्रतिशत नवजातों को गहन पुनर्जीवन की जरूरत होती है। ऐसे में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी नवजात की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। एनआरपी वह जीवनरक्षक प्रशिक्षण है, जो नवजात शिशु को जन्म के पहले ही क्षण सुरक्षित सांस दिलाने और उसके जीवन को बचाने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को सक्षम बनाता है।

प्रशिक्षण टीम में डॉ. ए. के. साहू, डॉ. मिथिलेश कुमार सिंह, डॉ. रणधीर मिश्रा तथा डॉ. कुमार आनंद शामिल रहे। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में लगभग 50 चिकित्सकों, नर्सिंग कर्मियों तथा सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़े स्वास्थ्यकर्मियों को व्यावहारिक "हैंड्स-ऑन" प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिससे वे आपात परिस्थितियों में नवजातों को त्वरित एवं प्रभावी जीवनरक्षक सहायता देने में सक्षम हो सकें।

कार्यक्रम में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स तथा नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम ऑफ इंडिया के बड़ी संख्या में सदस्य उपस्थित रहे।अंत में डॉ. मणि शंकर ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह अभियान केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रत्येक नवजात को जीवन की पहली सुरक्षित श्वास देने का राष्ट्रीय संकल्प है, जो स्वस्थ एवं सुरक्षित भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।कार्यक्रम के कोर्स समन्वयक डॉ. कमोद झा ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की, जबकि राज्य समन्वयक द्वारा नवजात पुनर्जीवन तकनीकों का लाइव डेमो दिया गया।

नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम ऑफ इंडिया के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रव्यापी नवजात पुनर्जीवन कार्यक्रम (एनआरपी) प्रशिक्षण दिवस के अंतर्गत दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (डीएमसीएच) में आयोजित एक दिवसीय व्यापक "हैंड्स-ऑन" प्रशिक्षण कार्यक्रम सफल आयोजन रहा।

यह कार्यक्रम इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी), फॉग्सी, यूनिसेफ के सहयोग तथा स्टेट हेल्थ सोसाइटी, बिहार के समर्थन से संपन्न हुआ। प्रत्येक नवजात को जन्म के तुरंत बाद सुरक्षित श्वास सहायता उपलब्ध कराना तथा "गोल्डन मिनट" के महत्व के प्रति स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित एवं जागरूक बनाया गया, जिससे नवजात मृत्यु दर में प्रभावी कमी लाई जा सके।

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