, March 26 -- याचिका में यह भी दावा किया गया है कि पिछले 20-25 वर्षों में दरभंगा और आसपास के क्षेत्रों में 28 से अधिक तालाबों को भरकर समाप्त कर दिया गया, जो शहरी जल-प्रबंधन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है।
तालाब बचाओ अभियान के अधिवक्ता कमलेश कुमार मिश्रा और सुश्री रेणु ने बताया कि इन आरोपों की जांच के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने दरभंगा के जिलाधिकारी और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिक की संयुक्त समिति गठित कर चार सप्ताह में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था, लेकिन एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। 12 मार्च 2026 को पारित आदेश में ट्रिब्यूनल ने इस देरी को गंभीरता से लेते हुए कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पाया कि कई प्रतिवादियों ने अब तक जवाब दाखिल नहीं किया है, जिन्हें चार सप्ताह का अंतिम अवसर दिया गया है।
इस महत्वपूर्ण आदेश में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 21 अप्रैल 2026 को निर्धारित तिथि को दरभंगा के जिलाधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य कर दी है। उन्हें अगली सुनवाई में स्वयं उपस्थित होकर या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से यह स्पष्ट करना होगा कि आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ और संयुक्त समिति की रिपोर्ट लंबित क्यों है। उन्हें संबंधित अभिलेखों के साथ पेश होने को कहा गया है। साथ ही, संयुक्त समिति को भी चार सप्ताह के भीतर हर हाल में अपनी रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
आदेश की प्रति बिहार सरकार के मुख्य सचिव और जिलाधिकारी को भेजी गई है, जिससे अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई करने वाली राष्ट्रीय हरित अधिकरण, कोलकाता के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ.ए. सेंथिल वेल की ओर से पारित संयुक्त आदेश और इस सख्त रुख ने दरभंगा में तालाबों पर हो रहे व्यापक अतिक्रमण के मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
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