, Oct. 15 -- झिझिया की आत्मा उसके गीतों में बसती है। लोकभाषा में रचे गए इन गीतों में देवी की वंदना, परिवार की कुशलता और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना एक साथ सुनाई देती है। "तोहरे भरोसे बरहम बाबा, झिझिया बनवलिन हो" और "डाकिनी के नजरिया ना लागे, साकिनी के बाण ना लागे" जैसे पारंपरिक गीत लोकसमाज की आस्थाओं और सांस्कृतिक अनुभवों को स्वर देते हैं।इन गीतों की विशेषता उनकी सहजता है। इनमें शास्त्रीय भाषा का आडंबर नहीं, बल्कि गांव की बोली, घरेलू जीवन की चिंता और सामूहिक प्रार्थना का अपनापन है। गीतों को गाते हुए महिलाएं केवल देवी से रक्षा की गुहार नहीं लगातीं, बल्कि अपने अनुभव, मान्यताएं और सांस्कृतिक स्मृतियां अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं। इस तरह झिझिया का गीत-संसार लोकसाहित्य की मौखिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

चंपारण के कई ग्रामीण इलाकों में नवरात्र के दौरान बालिकाओं के समूह घर-घर जाकर झिझिया खेलते हैं। सप्तमी से विजयादशमी तक चलने वाली इस परंपरा में ग्रामीण परिवार उन्हें अनाज, दक्षिणा अथवा शगुन देते हैं। यह आदान-प्रदान केवल आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि लोकअनुष्ठान के प्रति सामुदायिक सहभागिता और परस्पर संबंधों की अभिव्यक्ति भी है।

झिझिया में महिलाओं और बालिकाओं की केंद्रीय भूमिका इसे ग्रामीण सांस्कृतिक जीवन में विशिष्ट स्थान देती है। समूह में नृत्य करना, गीतों को याद रखना, घड़े को संतुलित करना और लय के साथ कदम मिलाना, इन सभी के माध्यम से नई पीढ़ी अनौपचारिक रूप से अपनी सांस्कृतिक विरासत सीखती है। यहां लोककला किसी औपचारिक पाठशाला में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल, गलियों और घरों के आंगन में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है।

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