, Sept. 15 -- महिलाओं की आर्थिक यात्रा की शुरुआत छोटी-छोटी बचत से हुई, लेकिन आज इसका दायरा काफी बड़ा हो चुका है। स्वयं सहायता समूहों में महिलाओं की साप्ताहिक बचत 2693 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। सामुदायिक निवेश निधि के रूप में लगभग 13,590 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं। इससे महिलाओं को अपनी आजीविका गतिविधियों के लिए पूंजी जुटाने में मदद मिल रही है ।6749 बैंक सखियों ने इस बदलाव को गांवों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके माध्यम से प्रतिवर्ष 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का डिजिटल वित्तीय लेन-देन हो रहा है। इससे बैंकिंग सेवाएं महिलाओं के लिए अधिक सुलभ हुई हैं और वित्तीय निर्णयों में उनकी भूमिका मजबूत हुई है। इसके साथ ही बैंकिंग सुविधाएँ समाज के उस तबके तक आसानी से पहुँची है जो बैंक जा पाने में असमर्थ होते हैं ।

जीविका से जुड़ी महिलाएं अब केवल खेती करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उत्पादन से लेकर बाजार तक अपनी भूमिका निभा रही हैं। राज्य में 46.89 लाख से अधिक महिला किसान आधुनिक और जलवायु-अनुकूल कृषि प(तियों से जुड़ी हैं। वहीं 61 महिला-नेतृत्व वाली किसान उत्पादक कंपनियां सामूहिक उत्पादन और बाजार से महिलाओं को जोड़ रही हैं। दुग्ध क्षेत्र में भी महिलाओं की सामूहिक ताकत दिखाई दे रही है। कौशिकी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी प्रतिदिन 35 हजार से अधिक महिला दुग्ध उत्पादकों से करीब 80 हजार लीटर दूध एकत्र कर रही है। इससे गांव की महिलाओं को सीधे संगठित बाजार से जोड़ने का अवसर मिला है।

ग्रामीण उद्यमिता में भी महिलाओं की पहचान मजबूत हुई है। सरकारी अस्पतालों और विभिन्न संस्थानों में संचालित 330 जीविका दीदी की रसोई रोजगार और सेवा दोनों का माध्यम बनी हैं। वहीं 'जीविका दीदी का सिलाई घर' के जरिए 50 लाख से अधिक आंगनबाड़ी बच्चों के लिए पोशाक की आपूर्ति की गई है। सबसे गरीब परिवारों को भी आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सतत् जीविकोपार्जन योजना के तहत 2 लाख से अधिक अत्यंत निर्धन परिवारों को आजीविका गतिविधियों से जोड़ा गया है। इनमें करीब 1.75 लाख परिवार क्रमिक रूप से गरीबी से बाहर निकलने में सफल हुए हैं।

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