, Sept. 13 -- विभागीय अधिकारियों ने बताया कि लाइब्रेरी में बढ़ने के लिए आने वाले बच्चों में कई ऐसे हैं जिन्होंने पूर्व में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और आज उन्हें एनआईओएस, बीबीओएसइ और इग्नू जैसे संस्थानों में नामांकन कराकर मुख्यधारा में लाया जा रहा है। साथ ही, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मार्गदर्शन, ऑनलाइन आवेदन में सहायता और विशेषज्ञों द्वारा करियर काउंसिलिंग एवं मेंटरिंग दी जा रही है।ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक समस्याओं और संसाधनों के अभाव में जो महिलाएं कभी घर से निकलने में भी झिझकती थीं, आज वे इन सेंटरों का पूर्ण स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन खुद संभाल रही हैं। प्रत्येक केंद्र पर एक प्रशिक्षित सामुदायिक पेशेवर विद्या-दीदी (डिजिटल एडुप्रेन्योर) के रूप में तैनात हैं, जो दैनिक संचालन से लेकर बच्चों को डिजिटल सेवाएं देने तक की कमान संभाल रही हैं। जिन हाथों में कभी सिर्फ घरेलू काम हुआ करता था, आज वे माउस और कीबोर्ड पर सरपट दौड़ रहे हैं।

विद्या-दीदी और लाइब्रेरी मैनेजर के रूप में काम करके हजारों महिलाएं अब नियमित आय अर्जित कर रही हैं।इससे न केवल उनके परिवार का जीवन स्तर सुधरा है, बल्कि घर और समाज के फैसलों में भी उनकी बात को सम्मान मिल रहा है। पढ़ाई और डिजिटल हुनर से जुड़कर दीदियों ने साबित किया है कि दिया है कि अगर सही अवसर मिले तो ग्रामीण भारत की तस्वीर पूरी तरह बदली जा सकती है।

ग्रामीण विकास और सूचना एवं जन सम्पर्क मंत्री श्रवण कुमार ने कहा किजीविका-दीदी की लाइब्रेरी केवल किताबों का केंद्र नहीं, बल्कि हमारी उन बहनों के आत्मसम्मान और सफलता की कहानी है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों को हराकर नया इतिहास रचा है। उन्होंने कहा कि राज्य में संचालित 118 पुस्तकालयों के माध्यम से आज एक लाख से अधिक युवाओं और 61 फीसदी बेटियों को अपने ही गांव में डिजिटल शिक्षा और करियर मार्गदर्शन मिल रहा है। विद्या-दीदियां आज गांव-गांव में ज्ञान का दीप जलाकर ग्रामीण बिहार को आत्मनिर्भर बना रही हैं।

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