, Aug. 29 -- कवि सत्यनारायण की कविता की सबसे बड़ी ताकत उसका जनसरोकार है। वे कठिन शब्दावली के बजाय ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे आम पाठक और श्रोता आसानी से समझ सके। यही वजह रही कि उनकी कविताएं पुस्तकालयों और साहित्यिक गोष्ठियों के साथ-साथ नुक्कड़ों, सभाओं और आंदोलनों तक पहुंचीं।
श्री सत्यनारायण को साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए 2020-21 के लिए उन्हें बिहार सरकार की हिन्दी सेवी सम्मान एवं पुरस्कार योजना के तहत नागार्जुन सम्मान के लिए चुना गया था। इसके अलावा उन्हें नागार्जुन सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान, रमण साहित्य पुरस्कार, गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार, शाद अजीमाबादी सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।
उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की है। पर्यावरण और जनजागरण से जुड़े कार्यक्रमों में उनके गीत 'बनी रहे धरती, धरती पर जल जीवन हरियाली' का भी उल्लेख मिलता है।
कवि सत्यनारायण बिहार हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 2021 में राज्य सरकार द्वारा समिति के पुनर्गठन के बाद उन्हें दोबारा इसका अध्यक्ष बनाया गया था और उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया गया था।
श्री सत्यनारायण की साहित्यिक यात्रा को देखें तो उसमें बिहार के बदलते सामाजिक और राजनीतिक जीवन की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। एक ओर जेपी आंदोलन के दौर में उनकी कविता सत्ता और व्यवस्था से सवाल करती है, तो दूसरी ओर बिहार का राजकीय गीत इसी धरती की गौरवशाली परंपरा को नमन करता है। 28 अगस्त 2026 को जन्मदिन से 15 दिन पहले नियति ने श्री सत्यनारायण को भले उनके चाहने वालों से छीन लिया, लेकिन उनकी स्मृतियों को ताजा करने के मशहूर साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने 'सत्यनारायण' समग्र नाम की पुस्तक का संग्रह किया है, जिसका लोकार्पण उनके 93वें जन्मदिन को प्रस्तावित है।
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