, Oct. 29 -- सेमिनार का उद्देश्य इन आवश्यकताओं को वैज्ञानिक तथ्यों एवं तकनीकी आकलन के आधार पर प्रस्तुत करना तथा गंगा जल संधि की भावी व्यवस्था के संदर्भ में बिहार के हितों से जुड़े विषयों पर सार्थक विमर्श करना है। बिहार की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियां राज्य को बाढ़ और सूखे, दोनों तरह की चुनौतियों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। गंगा तथा उत्तर बिहार की अनेक नदियां हिमालय से निकलती हैं और मानसून के दौरान अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद लाती हैं। बिहार की कम ढाल वाली भौगोलिक संरचना के कारण नदी की प्रवाह गति कम होने पर गाद नदी तल में जमा होती है। इससे नदी तल की ऊंचाई, जल प्रवाह की दिशा तथा नदी की जलवहन क्षमता प्रभावित होती है।
गाद का जमाव न केवल बाढ़ के जोखिम को प्रभावित करता है, बल्कि नदियों, बराजों, जलाशयों एवं अन्य जल स्रोतों की जलवहन और जलधारण क्षमता पर भी असर डालता है। इससे सिंचाई, पेयजल आपूर्ति तथा अन्य उपयोगों के लिए जल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। जलवायु परिवर्तन, वर्षा के स्वरूप में बदलाव, बढ़ती जनसंख्या, कृषि की आवश्यकताओं, शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण जल प्रबंधन की चुनौती और महत्वपूर्ण हो गई है।
बिहार में गाद प्रबंधन एवं रिवर सिस्टम के पुनर्स्थापन की आवश्यकता को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा 'बिहार जलस्रोत पुनर्स्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति', 2026 लागू की गई है। चूंकि गंगा नदी में गाद की समस्या अंतर्राज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रकृति की है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट गाद प्रबंधन नीति, दीर्घकालिक कार्ययोजना तथा गंगा बेसिन के राज्यों को तकनीकी एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय कोष की आवश्यकता है। बाढ़ प्रबंधन की योजनाओं में गाद प्रबंधन, नदी तल के वैज्ञानिक अध्ययन तथा आवश्यकता के अनुरूप ड्रेजिंग की संभावनाओं पर भी समग्रता से विचार किया जाना जरूरी है।
राज्य की जल आवश्यकताओं का आकलन केवल वर्तमान मांग तक सीमित नहीं है। भविष्य में कृषि, पेयजल, ऊर्जा, उद्योग और शहरी विकास के लिए जल की आवश्यकता में वृद्धि होने की संभावना है। इसके साथ ही, राज्य के जलाशयों एवं अन्य जल स्रोतों में गाद के जमाव तथा जल की अनियमित उपलब्धता से जल संचयन और उपयोग की क्षमता प्रभावित होती है।
गंगा जल संधि की भावी व्यवस्था पर विचार करते समय बिहार की जल आवश्यकताओं तथा गंगा बेसिन के अन्य राज्यों की जरूरतों को तथ्यात्मक आधार पर शामिल किया जाना महत्वपूर्ण होगा।
सेमिनार में विशेषज्ञों से अपेक्षा है कि वे उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों, तकनीकी अध्ययनों और अपने अनुभवों के आधार पर बिहार की वर्तमान एवं भावी जल मांग के आकलन, जल के न्यायसंगत उपयोग, गाद प्रबंधन, बाढ़ जोखिम में कमी तथा जल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के व्यावहारिक विकल्पों पर सुझाव देंगे। विचार-विमर्श के आधार पर तकनीकी एवं नीतिगत अनुशंसाएं तैयार करने का प्रयास किया जाएगा, जिससे बिहार का पक्ष भारत सरकार एवं संबंधित संस्थाओं के समक्ष तथ्यात्मक आधार पर प्रस्तुत किया जा सके।
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