पटना , अक्टूबर 14 -- िहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति (जीविका) ने दो दशकों के सफर ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा है। बीस साल पहले महिलाओं का श्रम अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा था, लेकिन आर्थिक फैसलों में उनकी भागीदारी नगण्य थी। बैंक जाना, ऋण लेना या बाजार में सौदा करना महिलाओं के जीवन का हिस्सा नहीं था। वर्ष 2006 मेंबिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन सोसायटी) के गठन और अलग-अलग जिलों के छह प्रखंडों से हुई स्वयं सहायता समूह की शुरुआत के बाद आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
मौजूदा समय में राज्य के 1.81 करोड़ परिवार 13.06 लाख स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़ चुके हैं। साथ ही 77,787 ग्राम संगठन और 1,683 संकुल स्तरीय संघ सामुदायिक नेटवर्क को सुदृढ़ कर रहे हैं। मौजूदा समय में एसएचजी के सहारे महिलाओं को करीब 76,549 करोड़ रुपये का बैंक ऋण मिल चुका है। इनका वित्तीय अनुशासन इतना अच्छा है कि वर्तमान गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) दर काफी कम है। 6,771 बैंक सखियां गांवों में वित्तीय सेवाओं की मजबूत कड़ी का काम कर रही हैं।
इन बैंक सखियों के माध्यम से बड़े पैमाने पर डिजिटल लेन-देन हो रहा है। ग्रामीण महिलाएं आज एक कुशल उद्यमी के तौर पर कृषि, पशुपालन, डेयरी, सिलाई, मशरूम उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई हैं।
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