, April 22 -- इस वर्ष अभियान में विशेष रूप से पुरुषों (पिताओं) की भागीदारी पर बल दिया गया है। अब बाल पोषण एवं देखभाल को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी न मानकर, इसे साझा पारिवारिक दायित्व के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों में पिताओं के लिए विशेष सत्र एवं कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं, जिनमें उन्हें संतुलित एवं पौष्टिक आहार सुनिश्चित करने, गर्भवती महिलाओं एवं छोटे बच्चों की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाने, पोषण ट्रैकर के उपयोग, बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने तथा स्क्रीन टाइम कम करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के मस्तिष्क का लगभग 85 प्रतिशत विकास छह वर्ष की आयु तक हो जाता है, विशेषकर जीवन के पहले 1000 दिनों में। इस अवधि में उचित पोषण, उत्तरदायी देखभाल, प्रारंभिक उत्प्रेरण (0-3 वर्ष) एवं खेल-आधारित शिक्षा (03-06 वर्ष) बच्चों के संज्ञानात्मक, शारीरिक एवं भावनात्मक विकास की मजबूत नींव रखते हैं। बिहार में कुपोषण, स्टंटिंग, वेस्टिंग एवं एनीमिया अभी भी प्रमुख चुनौतियां हैं। पोषण पखवाड़ा इन समस्याओं से निपटने के लिए जन-जागरूकता बढ़ाने, परिवार एवं समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने तथा व्यवहार परिवर्तन लाने का एक प्रभावी माध्यम है।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मातृ एवं शिशु पोषण को सुदृढ़ करना, 0-3 वर्ष के बच्चों में प्रारंभिक मस्तिष्क उत्प्रेरण को बढ़ावा देना, 03-06 वर्ष के बच्चों में खेल-आधारित शिक्षा को प्रोत्साहित करना, बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करना तथा आंगनबाड़ी केंद्रों को बेहतर आधारभूत संरचना, समुदाय की भागीदारी एवं गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के माध्यम से सशक्त बनाना है।
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