चंडीगढ़ , जुलाई 25 -- ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने समानांतर लाइसेंसिंग के जरिए बिजली वितरण क्षेत्र के 'पिछले दरवाजे से निजीकरण' की कोशिशों का कड़ा विरोध किया है। फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि यदि निजी कंपनियों को सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के नेटवर्क का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गयी, तो यह सार्वजनिक उपयोगिताओं के साथ विश्वासघात होगा और राज्य सरकार की बिजली कंपनियां वित्तीय रूप से पूरी तरह कंगाल हो जाएंगी। एआईपीईएफ के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे ने बताया कि बिजली अधिनियम में संशोधन करने के लगातार विफल प्रयासों के बाद, अब केंद्रीय बिजली मंत्रालय की सलाहकार समिति ने समानांतर वितरण लाइसेंस जारी करने के प्रस्तावित ढांचे पर चर्चा की है। उन्होंने इस दावे को पूरी तरह भ्रामक बताया कि निजी कंपनियों को समानांतर लाइसेंस देने से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार होगा।

शैलेंद्र दुबे ने सवाल उठाते हुए कहा, " जब बिजली नेटवर्क का स्वामित्व, संचालन, रखरखाव और अपग्रेडेशन पूरी तरह से सरकारी डिस्कॉम के पास ही रहेगा, तो महज एक निजी बिलिंग कंपनी के आ जाने से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता कैसे सुधर सकती है? सेवा की गुणवत्ता नेटवर्क की मजबूती पर निर्भर करती है, इस बात पर नहीं कि बिजली का बिल कौन जारी कर रहा है। इसका असली मकसद सिर्फ जनता के पैसे से बने सरकारी बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल कर निजी कंपनियों को मुनाफा कमाना है।"फेडरेशन के अनुसार, यदि ग्रिड या वितरण नेटवर्क में कोई खराबी आती है और बिजली गुल होती है, तो उसकी जिम्मेदारी सरकारी डिस्कॉम की ही बनी रहेगी, निजी कंपनी की नहीं। सरकारी कंपनियां नेटवर्क में निवेश और रखरखाव करती रहेंगी, जबकि निजी कंपनियां उसी बुनियादी ढांचे का उपयोग करके अधिक राजस्व देने वाले (हाई-रेवेन्यू) उपभोक्ताओं को निशाना बनाएंगी। इससे सरकारी डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति खराब होगी और आम जनता को सस्ती बिजली मिलने का अधिकार खतरे में पड़ जाएगा। एआईपीईएफ के मीडिया सलाहकार वी. के. गुप्ता ने कहा कि समानांतर वितरण लाइसेंस का मुद्दा इस समय देश भर में नया युद्धक्षेत्र बन गया है। कर्नाटक में कड़े विरोध के बाद अब यह फोकस हरियाणा पर स्थानांतरित हो गया है। उन्होंने सचेत किया कि यदि ऐसा कोई भी मॉडल कहीं भी लागू होता है, तो वह पूरे देश के लिए एक गलत मिसाल बन जाएगा।

फेडरेशन ने मांग की है कि बिजली क्षेत्र के सबसे बड़े हितधारक उपभोक्ता और बिजली कर्मचारी हैं। इसलिए मंत्रालय को कोई भी फैसला लेने से पहले कर्मचारी-इंजीनियर फेडरेशन, उपभोक्ता संगठनों और राज्य की बिजली कंपनियों के साथ सार्थक बातचीत करनी चाहिए। बिना व्यापक परामर्श के बिजली वितरण के ढांचे को बदलने वाली किसी भी नीति को जबरन लागू नहीं किया जाना चाहिए।

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