बारां , फरवरी 28 -- मध्य प्रदेश की सरहद से सटे राजस्थान में बारां जिले के रामगढ़ क्रेटर वाले संरक्षित वन अभयारण्य क्षेत्र में मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान से केपी-2 चीते का बार-बार आगमन होना स्पष्ट करता है कि बारां जिले के बियाबान जंगल इस प्रजाति के लिए अनुकूल, सुरक्षित और प्राकृतिक रूप से उपयोगी हैं।

यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि आवास-उपयुक्तता का मजबूत संकेत है।

हाल ही में एक पखवाड़े से चीता केपी-2 रामगढ़ और मांगरोल क्षेत्र के जंगलों में स्वच्छंद विचरण कर रहा है। एक बार पहले भी केपी-2 का लंबे अंतराल तक यहां जंगलों में पड़ाव रहा था। दुबारा कुछ समय बाद फिर इसका यहां आने से माना जा रहा है कि उसे इस क्षेत्र की आबोहवा के साथ ही जलस्रोतों से पीने को पानी और भोजन के लिये शिकार सुलभता से उपलब्ध हो जाता है।

इंटेक एडवाइजरी कमेटी बारां के अध्यक्ष विष्णु साबू और शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति के संरक्षक प्रशांत पाटनी का इस मामले में कहना है कि बार-बार ट्रेंकुलाइज करके चीते को वापस भेजना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसके बजाय, बारां जिले के जंगलों में वैज्ञानिक दृष्टि से उसकी आवासीय व्यवस्था करने की आवश्यकता है।

श्री साबू ने कहा कि किसी वन्यजीव का बार-बार उसी भू-भाग में लौटना उसके भोजन, पानी, आवरण और कम मानवीय हस्तक्षेप जैसे अनुकूल कारकों का प्रमाण होता है। बारां के वन परिदृश्य में ये सभी तत्व मौजूद हैं।

श्री पाटनी ने कहा कि चीते का लगातार बारां की ओर आकर्षित होना बताता है कि यहां जैव- विविधता, शिकार-आधार और प्राकृतिक गलियारे उपलब्ध हैं। ट्रेंकुलाइजेशन से तनाव बढ़ता है, इसके स्थान पर सह-अस्तित्व आधारित प्रबंधन अपनाया जाना चाहिए। दोनों पर्यावरण प्रेमियों ने सुझाव दिया कि बारां के चयनित वन क्षेत्रों में पायलट चीता- के प्राकृतिक आवास विकसित किये जायें। यहां माना जा रहा है कि बारां शाहबाद घाटी का भू- दृश्य पश्चिम मध्य भारत के वन्यजीव गलियारे से जुड़ने की क्षमता रखता है। समय रहते आवासीय व्यवस्था की गई, तो यह क्षेत्र चीतों के संरक्षण में एक नया मॉडल बन सकता है। इससे रामगढ़ से सीताबाड़ी होते हुए शाहबाद जंगल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व की सबसे बड़ी चीता कॉरिडोर परियोजना को बल मिल जाएगा।

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