दरभंगा , अगस्त 25 -- लित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग के तत्वावधान में मंगलवार को 'सांस्कृतिक वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और पहचान का संकट' विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में वैश्वीकरण और उपभोक्तावादी संस्कृति के समकालीन समाज पर पड़ रहे प्रभावों पर अकादमिक विमर्श किया गया।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता जानेमाने समाजशास्त्री एवं ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. गोपी रमण प्रसाद सिंह ने कहा कि आधुनिक दौर में वैश्वीकरण और बढ़ते उपभोक्तावाद ने पारंपरिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। बाजारवाद, बाजारीकरण और पण्यीकरण के दौर में मानवीय मूल्य तथा स्थानीय सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे गौण होते जा रहे हैं। इससे विशेषकर युवा पीढ़ी के समक्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान का गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है।उन्होंने कहा कि तकनीकी एवं आर्थिक प्रगति को अपनाना समय की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों और नैतिक मूल्यों की रक्षा करना भी जरूरी है। उन्होंने युवाओं से आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन कायम करने का आह्वान किया।
विभागाध्यक्ष प्रो. ध्रुव कुमार के निर्देशन में आयोजित संगोष्ठी में डॉ. लक्ष्मी कुमारी ने स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश कराया। मंच संचालन डॉ. प्रमोद गांधी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राफिया काजिम ने किया। कार्यक्रम का प्रबंधन डॉ. सुनीता कुमारी ने किया।
संगोष्ठी में 100 से अधिक विद्यार्थियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम के अंत में प्रो. सिंह ने समाजशास्त्र विभाग को अपनी लिखित पुस्तक 'परिवर्तन और विकास का समाजशास्त्र' की दस प्रतियां उपहार स्वरूप प्रदान की।
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