नयी दिल्ली , सितंबर 25 -- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बाघ अभयारण्यों के लिए स्थानीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय प्रबंधन और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप संरक्षण उपाय अपनाने की जरूरत पर बल दिया है।

श्री यादव ने शुक्रवार को यहां राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के सहयोग से आयोजित 'भारत में बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन' के छठे चक्र की कार्यशाला को संबोधित करते हुए यह बात कही। कार्यशाला में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, भारतीय वन्यजीव संस्थान, राज्य वन विभागों, बाघ अभयारण्य प्रबंधन टीमों और विशेषज्ञों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

श्री यादव ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण और उसके मूल्यांकन में बदलती वैज्ञानिक प्रक्रियाओं और प्रौद्योगिकियों को लगातार शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विज्ञान आधारित दृष्टिकोण के साथ मानवीय संवेदना, मूल्यों और दूरदृष्टि को भी महत्व दिया जाना चाहिए ताकि वन विभागों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर तालमेल बना रहे। उन्होंने बाघ अभयारण्य मूल्यांकन में स्थानीय पारिस्थितिकी और समाजशास्त्र के विशेषज्ञों तथा स्थानीय युवाओं को शामिल किए जाने की भी जरूरत बतायी।

उन्होंने कहा कि मूल्यांकन के परिणाम प्रत्येक बाघ अभयारण्य की विशिष्ट जरूरतों और चुनौतियों को प्रतिबिंबित करने चाहिए। मानव-वन्यजीव संघर्ष का क्षेत्रवार आकलन और संरक्षण के परिणामों का माप किया जाना चाहिए तथा मूल्यांकन में व्यावसायिकता और निष्पक्षता को प्रमुखता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे संरक्षण प्रबंधन को मजबूत करने के लिए बेहतर आधार तैयार होगा।

भारत में प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन का छठा चक्र देश के सभी 58 बाघ अभयारण्यों को कवर करेगा। इस बार 'ठोस अपशिष्ट प्रबंधन' को अलग मूल्यांकन मानदंड के रूप में शामिल किया गया है। कार्यशाला के दौरान एमईई-टीआर 2026 की तकनीकी पुस्तिका भी जारी की गयी, जिसमें छठे चक्र के मूल्यांकन का ढांचा दिया गया है।

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