जयपुर , मई 18 -- राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे ने सोमवार को यहां राजस्थान विधानसभा के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर नव निर्मित प्रतीक चिह्न का विमोचन और विधानसभा के तेरह द्वारों का नामकरण किया।

इस अवसर पर श्री बागडे ने विधानसभा को लोकतंत्र का पवित्र सदन बताते हुए कहा कि राजस्थान विधानसभा का गौरवमय इतिहास रहा है। स्वतंत्र भारत में भले ही 1952 में विधानसभा गठित हुई परन्तु राजस्थान में 1913 में स्वतंत्रता से पूर्व ही महाराजा गंगा सिंह ने प्रतिनिधि सभा की स्थापना कर विधानसभा की शुरुआत कर दी थी। इस इतिहास में अमृतकाल के अवसर पर प्रतीक चिह्न का लोकार्पण महत्वपूर्ण हैं।

राज्यपाल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की पहल पर तैयार यह लोगो राजस्थान के जन मानस की सोच का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने प्रतीक चिह्न में सम्मिलित राज्य पुष्प रोहिडा, खेजड़ी और विधानभवन की छवियों की चर्चा करते हुए कहा कि यह राजस्थान की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में भी उत्सवधर्मिता से जीवन जीने वाले लोगों की जीवटता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि खेजड़ी तो राजस्थान का कल्प वृक्ष है। उन्होंने खेजड़ली में पेड़ों के लिए हुए बलिदान की वृक्ष संस्कृति की चर्चा करते हुए कहा कि इसके साथ रोहिड़े पुष्प का समावेश समन्वय की संस्कृति का द्योतक है।

राज्यपाल ने भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष गणेश वासुदेव मावलंकर की चर्चा करते हुए कहा " एक बार उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला वह अर्थशास्त्र पढ़ाता है। आपको प्रबंध से जुडी विशेषज्ञता चाहिए तो बताएं। मावलंकरजी ने देखा कि उसने आवश्यकता से अधिक भोजन थाली में लिया और खाने के पश्चात उसमें से भी बहुत सारा छोड़ दिया। वह बोले तुम अपने भोजन का प्रबंध तो ठीक से कर नहीं सकते फिर दूसरा प्रबंध कैसे करोगे।"श्री बागडे ने कहा कि जीवन में आदर्श आचरण के साथ सभी चीजों का प्रबंधन व्यवहार में आना जरूरी है। उन्होंने पिछड़े और गरीब लोगों की शिक्षा प्रबंधन को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी देश शिक्षा से ही आगे जाता है। वहां के बच्चों में होने वाले टेलेंट से जाता है। शिक्षा को व्यवहार में लाने की जरूरत है। सभी स्कूल अच्छे कैसे हों। वहां व्यावहारिक शिक्षा कैसे मिले, इस पर सभी मिलकर ध्यान दें।

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