(जन्मदिवस 04 अगस्त के अवसर पर)मुंबई, 03 अगस्त (वार्ता) हिंदी सिनेमा के महान गायक, अभिनेता, संगीतकार, निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक किशोर कुमार को भारतीय फिल्म जगत की ऐसी बहुमुखी प्रतिभा के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी अनूठी आवाज और अभिनय से कई पीढ़ियों के दर्शकों और श्रोताओं का दिल जीता।
04 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में अधिवक्ता कुंजीलाल गांगुली के घर जन्मे आभास कुमार गांगुली, आगे चलकर किशोर कुमार के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनका रुझान संगीत की ओर था। वे महान गायक के.एल. सहगल से बेहद प्रभावित थे और उनकी तरह पार्श्वगायक बनना चाहते थे। 18 वर्ष की आयु में वह मुंबई पहुंचे, जहां उनके बड़े भाई अशोक कुमार पहले से ही स्थापित अभिनेता थे। अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर अभिनय करें, जबकि किशोर की पहली पसंद गायन थी।
संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद किशोर कुमार ने अभिनय के साथ-साथ गायन का सफर शुरू किया। वर्ष 1948 में फिल्म 'जिद्दी' में अभिनेता देव आनंद के लिए उन्होंने सहगल शैली में 'मरने की दुआएं क्यों मांगूं' गीत गाकर पार्श्वगायन की शुरुआत की। वर्ष 1951 में फिल्म 'आंदोलन' से बतौर नायक उन्होंने अभिनय करियर शुरू किया, हालांकि पहचान उन्हें वर्ष 1953 की फिल्म 'लड़की' से मिली।
वर्ष 1964 में फिल्म 'दूर गगन की छांव में' के जरिए किशोर कुमार ने निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने 'दूर का राही', 'हम दो डाकू', 'बढ़ती का नाम दाढ़ी', 'चलती का नाम जिंदगी' और 'ममता की छांव में' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने 'झुमरू', 'दूर गगन की छांव में', 'दूर का राही', 'जमीन आसमान' और 'ममता की छांव में' जैसी फिल्मों में संगीत भी दिया तथा निर्माता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई।
करियर के शुरुआती दौर में उन्हें लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा। फिल्मों में काम कम मिलने पर वे स्टेज शो कर जीवनयापन करते थे। एक ऐसे ही कार्यक्रम में संगीतकार ओ. पी. नैयर ने उनकी गायकी सुनकर कहा था कि महान प्रतिभाएं अक्सर जन्म लेती हैं, लेकिन किशोर कुमार जैसा पार्श्वगायक हजार वर्षों में एक बार पैदा होता है। इस विचार का समर्थन पार्श्वगायिका आशा भोंसले ने भी किया था।
वर्ष 1969 में निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की फिल्म 'आराधना' ने किशोर कुमार के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। मूल संगीतकार सचिन देव बर्मन के अस्वस्थ होने के बाद उनके पुत्र राहुल देव बर्मन ने फिल्म का संगीत पूरा किया। फिल्म के गीत 'मेरे सपनों की रानी' और 'रूप तेरा मस्ताना' जबरदस्त लोकप्रिय हुए। 'रूप तेरा मस्ताना' के लिए किशोर कुमार को पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला और इसके बाद वे हिंदी फिल्म संगीत के सबसे लोकप्रिय पार्श्वगायकों में शामिल हो गए।
वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान दिल्ली में आयोजित एक सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रस्तुति से जुड़े विवाद के बाद आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके गीतों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई। आपातकाल समाप्त होने के बाद जनवरी 1977 में उनका गीत 'दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना' फिर से प्रसारित हुआ।
किशोर कुमार को अपने करियर में आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने 600 से अधिक हिंदी फिल्मों के लिए गीत गाए और बंगाली, मराठी, असमिया, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी तथा ओड़िया फिल्मों में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा।
उन्होंने अनेक अभिनेताओं को अपनी आवाज दी, वहीं कुछ अवसरों पर महान गायक मोहम्मद रफी ने भी किशोर कुमार पर फिल्माए गए गीत गाए। कहा जाता है कि रफी साहब इसके लिए केवल एक रुपये का पारिश्रमिक लिया करते थे।
वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने फिल्मों से संन्यास लेकर अपने गृहनगर खंडवा लौटने का निर्णय लिया था। वह अक्सर कहा करते थे, "दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे।" लेकिन यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। 13 अक्टूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
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