पंकज शर्मा से....रायपुर , मार्च 31 -- ) केंद्र सरकार द्वारा देश को नक्सलियों से मुक्त करने की समय-सीमा समाप्त होने के दिन मंगलवार को बस्तर एक अलग ही वास्तविकता के साथ जागा। यहां अब न तो गोलीबारी की आवाजें सुनाई दे रही हैं और न ही घात लगाकर हमलों की चेतावनियां, बल्कि एक सतर्क और कुछ हद तक अनजानी शांति का एहसास देखने को मिल रहा है।
दक्षिण छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्सों, विशेषकर बस्तर क्षेत्र में माहौल बदलता हुआ नजर आ रहा है। ग्रामीण अब अधिक खुलकर बातचीत कर रहे हैं। पहले संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में आवाजाही बढ़ी है और युवाओं में यह विश्वास पनप रहा है कि हिंसा का लंबा दौर अब समाप्त हो रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे करीब दो वर्षों से लगातार चल रहे सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास पर जोर, तथा लक्षित विकास योजनाओं का संयुक्त प्रभाव है।
राज्य के उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि इन प्रयासों का समग्र असर अब उन जिलों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जो कभी माओवादी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र माने जाते थे। श्री शर्मा ने कहा कि राज्य में नक्सली हिंसा लगभग समाप्त हो गयी है। अधिकांश नक्सली या तो मारे गये हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) के वरिष्ठ माओवादी नेता पापा राव के अपने साथियों और हथियारों सहित आत्मसमर्पण करने के बाद माओवादियो का शीर्ष नेतृत्व लगभग खत्म हो चुका है।
उन्होंने कहा कि बस्तर के समुदाय अब मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों को स्वीकार कर रहे हैं, जिससे सामान्य स्थिति बहाल हो रही है। पिछले दो वर्षों में ही 3,000 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिनमें वरिष्ठ पदाधिकारी से लेकर निचले स्तर के कैडर शामिल हैं। 2,000 से अधिक की गिरफ्तारी हुई है, जबकि 500 से अधिक माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए हैं। अधिकारियों का अनुमान है कि कुल मिलाकर 5,000 से अधिक सशस्त्र कैडर की कमी आई है, जिससे संगठन की कार्यक्षमता पर बड़ा असर पड़ा है।
श्री शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ में अब नक्सलियों को कोई बड़ा नेता सक्रिय नहीं है। केवल उत्तर और दक्षिण बस्तर के दूरस्थ इलाकों में 30 से 40 माओवादी कैडर की छिटपुट मौजूदगी रह गई है, जिन पर आत्मसमर्पण का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
बस्तर, कबीरधाम, खैरागढ़-छुईखदान, राजनांदगांव, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, धमतरी, गरियाबंद और महासमुंद जैसे जिले, जो कभी माओवादी नक्शे में प्रमुखता से चिन्हित थे, अब उग्रवाद मुक्त हाे गये हैं। अधिकारियों के अनुसार बस्तर के 95 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र से माओवादी प्रभाव समाप्त हो चुका है।
यह बदलाव केवल बल प्रयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि रणनीति में बदलाव का भी नतीजा है। सुरक्षा अभियान अब सटीक खुफिया जानकारी और तकनीकी सहयोग के आधार पर संचालित हो रहे हैं। उपमुख्यमंत्री ने इसरो (इसरो), एनटीआरओ जैसी एजेंसियों तथा आईटीबीपी (आईटीबीपी) और एनएसजी (एनएसजी) जैसे बलों की भूमिका को सराहते हुए कहा कि घने जंगलों में निगरानी और ऑपरेशन की योजना बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार ने उन सामाजिक और आर्थिक कारणों को भी दूर करने का प्रयास किया है, जिनके कारण नक्सलवाद को बढ़ावा मिला। 'बस्तर ओलंपिक' जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को खेल और सामाजिक गतिविधियों से जोड़ा है, जबकि 'बस्तर पंडुम' के माध्यम से स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया है।
बताया जा रहा है कि अगले चरण की रूपरेखा भी तैयार की जा रही है। आंतरिक क्षेत्रों में स्थापित लगभग 400 सुरक्षा शिविरों को धीरे-धीरे विकास केंद्रों में परिवर्तित किया जाएगा, जहां स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं, पुलिस इकाइयां और लघु वनोपज प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य सुरक्षा आधारित मॉडल को एक सुलभ और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था में बदलना है।
अभी कुछ चुनौतियां बाकी हैं । इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) अब भी गंभीर खतरा बने हुए हैं। जंगलों के रास्तों, गांवों और निर्माण स्थलों पर छिपाए गए ये विस्फोटक सुरक्षा बलों और आम नागरिकों दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार 'आईईडी मुक्त पंचायत' मॉडल पर काम कर रही है, जिसके तहत प्रभावित क्षेत्रों को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित बनाया जाएगा, ताकि आम जीवन में सुरक्षा की भावना बहाल हो सके। पुलिस अधिकारियों के अनुसार विकास कार्यों को निर्बाध रूप से आगे बढ़ाने के लिए यह पहल महत्वपूर्ण होगी।
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