पटना , अगस्त 06 -- िसी बच्चे के जीवन के शुरुआती छह वर्ष उसके शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माने जाते हैं। यदि इस दौरान विकास में आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा की समय रहते पहचान हो जाए, तो बच्चे को सामान्य जीवन की मुख्यधारा से जोड़ना आसान हो जाता है। इसी सोच के साथ बिहार सरकार ने राज्य के बुनियाद केंद्रों को बच्चों के विकास संबंधी समस्याओं की शुरुआती पहचान और हस्तक्षेप का केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
समाज कल्याण विभाग की संस्था 'सक्षम' ने समेकित क्षेत्रीय पुनर्वास केंद्र (सीआरसी) और राज्य स्वास्थ्य समिति के सहयोग से एक विस्तृत मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) तैयार की है। इसकी जानकारी गुरुवार को सक्षम सभागार में आयोजित बैठक के दौरान आईसीडीएस निदेशक-सह-सक्षम की मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी डॉ. प्रीति ने दी।
डॉ. प्रीति ने बताया कि कई बार बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं शुरुआती उम्र में ही दिखाई देने लगती हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में उपचार देर से शुरू हो पाता है।
नई मानक कार्यप्रणाली तीन प्रमुख आयामों पर आधारित है। पहले चरण में विकास संबंधी देरी और विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं से प्रभावित बच्चों की शीघ्र पहचान और उनके लिए शुरुआती हस्तक्षेप की व्यवस्था की जाएगी। दूसरे चरण में स्वास्थ्य और समाज कल्याण विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर बच्चों को आवश्यक चिकित्सीय एवं पुनर्वास सेवाओं से जोड़ा जाएगा।
तीसरे चरण में बुनियाद केंद्रों के माध्यम से इन सेवाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। नई व्यवस्था के तहत जन्म से छह वर्ष तक के बच्चों में विकास संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान कर उन्हें बुनियाद केंद्रों पर जांच, परामर्श, उपचार और पुनर्वास की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। मुख्य रूप से दिव्यांगता, स्वलीनता (ऑटिज्म), मस्तिष्क पक्षाघात, सुनने में कठिनाई, एक से अधिक प्रकार की दिव्यांगता तथा मांसपेशियों से जुड़ी गंभीर बीमारियों से प्रभावित बच्चों को प्राथमिकता दी जाएगी।
बैठक में बताया गया कि सिर्फ बच्चों का उपचार ही पर्याप्त नहीं है। अभिभावकों को भी बच्चों की विशेष आवश्यकताओं, देखभाल और समुचित विकास के लिए प्रशिक्षित एवं जागरूक बनाया जाएगा।
राज्य में स्वास्थ्य विभाग के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिला स्तरीय शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र पहले से संचालित हैं। वहीं पटना स्थित समेकित क्षेत्रीय पुनर्वास केंद्र में भी विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं से प्रभावित बच्चों के लिए विशेष सेवाएं उपलब्ध हैं। अब इन व्यवस्थाओं को बुनियाद केंद्रों से जोड़कर सेवाओं का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़ाया जाएगा।
बैठक में बुनियाद केंद्रों के माध्यम से शीघ्र पहचान और हस्तक्षेप की सेवाएं शुरू करने की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान आईजीआईएमएस, राज्य स्वास्थ्य समिति, यूनिसेफ, समेकित क्षेत्रीय पुनर्वास केंद्र, आरईएफ, आईसीडीएस और जीविका के प्रतिनिधियों ने अपने सुझाव भी दिए।
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