..सैबल गुप्ता सेकोलकाता , जुलाई 15 -- पश्चिम बंगाल सरकार 17 जुलाई से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में एक विधेयक लाने की तैयारी कर रही है जिसके ज़रिए चुने हुए ग्राम पंचायत प्रधानों से उनके वित्तीय अधिकार छीनकर, 'पश्चिम बंगाल पंचायत अधिनियम, 1973' में संशोधन करके ये ज़िम्मेदारियां सरकारी अधिकारियों को सौंपी जायेंगी।
सूत्रों के मुताबिक इस प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य राज्य भर में ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को लागू करने में वित्तीय निगरानी को मज़बूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना और जवाबदेही में सुधार करना है। मौजूदा व्यवस्था के तहत, ग्राम पंचायत प्रधान कई बड़े ग्रामीण विकास कार्यक्रमों पर वित्तीय अधिकार रखते हैं, जिनमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) और 15वें वित्त आयोग के अनुदान से वित्तपोषित परियोजनाएँ शामिल हैं। उन्हें टेंडर मंज़ूर करने, खर्च को मंज़ूरी देने और विकास कार्यों के लिए भुगतान मंज़ूर करने का अधिकार है।
प्रस्तावित संशोधन के साथ ये वित्तीय अधिकार ग्राम पंचायतों में तैनात कार्यकारी सहायकों को सौंपे जायेंगे , हालांकि चुने हुए प्रतिनिधि स्थानीय निकायों के प्रमुख बने रहेंगे, लेकिन वित्तीय मंज़ूरी और बिल मंज़ूरी का काम सरकारी अधिकारी संभालेंगे।
पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार यह फ़ैसला पिछली सरकार के कार्यकाल में ग्राम पंचायतों के कामकाज में वित्तीय अनियमितताओं के बार-बार लगे आरोपों के बाद लिया गया है। उन्होंने कहा, "चुने हुए प्रधानों के बजाय सरकारी अधिकारियों को वित्तीय अधिकार सौंपने से भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम होगी, सार्वजनिक धन की निगरानी बेहतर होगी और विकास परियोजनाओं को सुचारू रूप से लागू किया जा सकेगा। कानून पारित होने के एक हफ़्ते के भीतर यह बदलाव पूरा कर लिया जायेगा।"यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब राज्य सरकार का दावा है कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद बड़ी संख्या में ग्राम पंचायत प्रधानों ने अपने कार्यालयों में आना बंद कर दिया है, जिससे प्रशासनिक शून्यता पैदा हो गयी है और कई ग्रामीण विकास योजनाओं का क्रियान्वयन बाधित हुआ है।
अधिकारियों ने बताया कि लगभग 80 प्रतिशत ग्राम पंचायत प्रधान काम से अनुपस्थित रहे हैं, जिससे कई ग्रामीण विकास कार्यक्रम लगभग ठप हो गये हैं।
पश्चिम बंगाल में 3,354 ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें से 3,200 से अधिक पर हाल तक तृणमूल कांग्रेस का नियंत्रण था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चूंकि राज्य की ज़्यादातर ग्राम पंचायतों पर तृणमूल कांग्रेस का नियंत्रण है, इसलिए इस प्रस्तावित विधेयक का मकसद चुने हुए पंचायत नेताओं के वित्तीय अधिकारों को कम करना है, ताकि भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ग्राम पंचायतों के कामकाज पर ज़्यादा प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण रख सके।
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