कोलकाता , अक्टूबर 22 -- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान राजनीतिक बाधाओं और अपने बुक स्टॉलों से जुड़े विवादों के बावजूद 21 अक्टूबर) तक प्रदेश भर में लगभग एक करोड़ रुपये की किताबें बेचे जाने का दावा किया है।।
बिक्री के इन आंकड़ों ने पार्टी के प्रदेश नेतृत्व को कुछ हद तक हौसला दिया है और यह ऐसे समय में हुआ है जब बंगाल में वामपंथी दल चुनावी रूप से हाशिए पर हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, त्योहारी मौसम के दौरान पूरे राज्य में लगभग 1,200 किताबों के स्टॉल लगाये गये थे। उत्तर 24 परगना जिला सबसे आगे रहा, जहां 10 लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। जादवपुर के बस स्टैंड पर लगे स्टॉल ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया; दशमी की दोपहर तक वहां 14 लाख रुपये की किताबें बिक चुकी थीं। पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि शाम तक कुल बिक्री 15 लाख रुपये पार कर जायेगी। यह स्टॉल 23 अक्टूबर तक खुला रहेगा।
राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ फिर से मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही पार्टी के लिए बिक्री के ये आंकड़े काफी अहम हैं। राज्य विधानसभा या राज्य से लोकसभा में माकपा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। हाल के चुनावों में पार्टी के वोट शेयर में भी भारी गिरावट आयी है, जिससे वामपंथ के पारंपरिक राजनीतिक आधार के भविष्य पर सवाल खड़े हो गये हैं।
पार्टी नेताओं का मानना है कि उनके बुक स्टॉलों पर मिली प्रतिक्रिया से पता चलता है कि चुनावी गिरावट का मतलब यह नहीं है कि वामपंथी विचारधारा एवं साहित्य में लोगों की दिलचस्पी भी उसी अनुपात में कम हो गयी है।
माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य एवं पूर्व राज्य मंत्री सुजन चक्रवर्ती ने इस प्रतिक्रिया का श्रेय बंगाल की शिक्षित आबादी के कुछ हिस्सों के बीच वामपंथी विचारधारा के निरंतर आकर्षण को दिया।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, मार्क्सवादी साहित्य, समकालीन राजनीति पर किताबें और वामपंथी दृष्टिकोण को दर्शाने वाले प्रकाशन की मांग सबसे अधिक रही। पार्टी कार्यकर्ताओं ने यह भी बताया कि 'जनरेशन जेड' के लोगों में काफी दिलचस्पी देखी गयी, जो पार्टी नेतृत्व के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि युवा पाठक राजनीतिक साहित्य में रुचि ले रहे हैं।
यह बिक्री ऐसे समय में हुई है जब बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में माकपा के बुक स्टॉलों पर तोड़फोड़ और टकराव की कई घटनाएं सामने आयी हैं। पार्टी सूत्रों का दावा है कि लगभग 100 स्टॉलों पर हमले हुए या उनके कामकाज में बाधा डाली गयी। इनमें से करीब 15 से 20 स्टॉल दोबारा नहीं खुल सके जबकि बाकी स्टॉलों ने अपना काम फिर से शुरू कर दिया।
पुलिस, केंद्रीय बलों और नगर निकाय अधिकारियों के साथ हुई झड़प के बाद जाधवपुर का स्टॉल विवाद का केंद्र बन गया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने स्टॉल को हटाने की कोशिशों का विरोध किया जिससे यह जगह विपक्ष के कुछ धड़ों के लिए एकजुट होने का केंद्र बन गयी। इस स्टॉल ने वामपंथ के पारंपरिक समर्थक से बाहर के लोगों को भी आकर्षित किया। तृणमूल कांग्रेस के नेता एवं बेलेघाटा के विधायक कुणाल घोष तथा पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष शुभंकर सरकार उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने कथित रूप से इस स्टॉल का दौरा किया और किताबें खरीदीं।
जिन इलाकों में आयोजकों को और ज्यादा बाधाएं उत्पन्न होने का डर था, वहां माकपा कार्यकर्ताओं ने एक वैकल्पिक तरीका अपनाया। वे वैन और ई-रिक्शा में किताबें भरकर रिहायशी इलाकों और गांवों तक ले गए। पार्टी में 'दुयारे बुकस्टॉल' (यानी लोगों के दरवाजे पर बुकस्टॉल) के नाम से जानी जाने वाली इस पहल की मदद से कार्यकर्ता स्थायी स्टॉल लगाने में आ रही दिक्कतों के बावजूद किताबें बेचना जारी रख सके।
जादवपुर स्टॉल से जुड़े माकपा राज्य समिति के सदस्य सुदीप सेनगुप्ता ने बताया कि इस साल की बिक्री ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। इससे पहले, 2022 में इस स्टॉल पर सबसे ज़्यादा बिक्री हुई थी, जो छह लाख रुपये से थोड़ी ही अधिक थी।
पार्टी के प्रकाशन विभाग, नेशनल बुक एजेंसी को बिक्री में और बढ़ोतरी की उम्मीद है।
माकपा अब इस पहल को काली पूजा और जगद्धात्री पूजा तक बढ़ाने की तैयारी कर रही है जिसके तहत बारासात, कृष्णानगर और चंदननगर में स्टॉल लगाये जायेंगे।
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