कोलकाता , मई 10 -- पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ की सनसनीखेज हत्या की जांच कर रहे जांचकर्ताओं के हाथ एक अहम सुराग लगा है। पुलिस ने बाली निवेदिता सेतु टोल प्लाजा के डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड के जरिए हमलावरों का पीछा करना शुरू कर दिया है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, जांचकर्ता अब एक सिल्वर कलर की निसान माइक्रा कार से जुड़े यूपीआई लेनदेन की बारीकी से जांच कर रहे हैं, जिसके बारे में माना जा रहा है कि इसका इस्तेमाल हमले में किया गया था। आरोप है कि छह मई को मध्यमग्राम में गोलीबारी से कुछ देर पहले इसी वाहन को श्री रथ की कार के आगे लगाकर उनका रास्ता रोका गया था। जांच से पता चला है कि संदिग्ध वाहन ने बाली टोल प्लाजा पार किया और डिजिटल माध्यम से टोल शुल्क का भुगतान किया था।
पुलिस अब उस मोबाइल नंबर, बैंक खाते और भुगतान विवरण की पहचान करने की कोशिश कर रही है, जिससे यह यूपीआई भुगतान किया गया था। जांचकर्ताओं को उम्मीद है कि यह डिजिटल फुटप्रिंट हमलावरों तक पहुंचने और अपराध से पहले और बाद में उनकी आवाजाही का पता लगाने में सबसे बड़ी सफलता साबित हो सकता है। टोल प्लाजा के सीसीटीवी फुटेज भी जुटा लिए गए हैं, जिनमें संदिग्ध कार की स्पष्ट तस्वीरें मिलने का दावा किया जा रहा है।
वायु सेना के पूर्व कर्मचारी श्री रथ की हत्या ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था। उन पर उस समय हमला हुआ जब वह कोलकाता से घर लौट रहे थे। जांच से पता चलता है कि हमलावरों ने बेहद सावधानी से इस पूरी साजिश को अंजाम दिया था। वारदात के दौरान एक कार और दो मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल किया गया था। हत्या के बाद हमलावर कार को मौके के पास छोड़कर मोटरसाइकिलों से फरार हो गए थे।
जांच में यह भी सामने आया है कि हमले में इस्तेमाल की गई निसान माइक्रा कार संभवतः झारखंड से लाई गई थी। पश्चिम बंगाल पुलिस की एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) संदिग्धों की तलाश में उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है और वहां कई स्थानों पर छापेमारी की जा रही है। अपराधियों और उनके नेटवर्क का पता लगाने के लिए अंतर-राज्यीय समन्वय भी शुरू कर दिया गया है।
इससे पहले, पुलिस ने हवाई अड्डे के पास से एक मोटरसाइकिल और बाद में जांच के दौरान एक दूसरी मोटरसाइकिल बरामद की थी। जांचकर्ताओं ने पाया कि बरामद दोनों मोटरसाइकिलों और छोड़ी गई कार पर लगी नंबर प्लेटें फर्जी थीं। इसके अलावा, पहचान मिटाने के लिए वाहनों के चेसिस नंबरों के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी।
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