नैनीताल , अगस्त 11 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मंगलवार को महत्वपूर्ण आदेश जारी कर आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाओं के फार्मासिस्टों की वरिष्ठता से जुड़े विवाद का पटाक्षेप कर दिया है।
न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण के आदेश को बरकरार रखते याचिकाओं को खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबंधित फार्मासिस्टों की पारस्परिक वरिष्ठता सात नवंबर 2012 को जारी नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति आदेश में निर्धारित मेरिट के आधार पर तय की जानी चाहिए। वर्ष 2009 की मूल नियुक्ति के आधार पर वरिष्ठता निर्धारित करना सही नहीं था।
खंडपीठ ने विगत तीन अगस्त को अंतिम सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ताओं कुमारी पूनम भट्ट और अन्य तथा धर्मेंद्र प्रसाद एवं अन्य की ओर से दोनों याचिकाओं में उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण के तीन मई 2021 के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामला वर्ष 2009 में आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाओं के फार्मासिस्टों की भर्ती से जुड़ा है। पांच अक्टूबर 2009 को भर्ती का विज्ञापन जारी हुआ था। चयन समिति ने 25 नवंबर 2009 को निर्णय लिया था कि बैक पेपर या सप्लीमेंट्री परीक्षा के माध्यम से डिप्लोमा पास करने वाले अभ्यर्थियों को अलग श्रेणी में रखते हुए उन अभ्यर्थियों के नीचे रखा जाएगा, जिन्होंने बिना सप्लीमेंट्री या बैक पेपर के परीक्षा पास की थी। इसके चलते कुछ अभ्यर्थी मेरिट में नीचे चले गए और नियुक्ति से वंचित रह गए।
इस चयन प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने तीन अगस्त 2012 को चयन सूची निरस्त कर नियमों के अनुसार नई चयन सूची तैयार करने और नियुक्तियां करने के निर्देश दिए। इसके बाद चार सितंबर 2012 को दायर विशेष अपील भी खारिज कर दी गई। हालांकि, विशेष अपील में संबंधित अभ्यर्थियों को यह स्वतंत्रता दी गई थी कि पुनर्नियुक्ति मिलने की स्थिति में वे अपनी नियुक्ति को मूल नियुक्ति की तारीख से प्रभावी कराने के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं।
इसके अनुपालन में राज्य सरकार ने 25 सितंबर 2012 को निदेशक आयुर्वेदिक एवं यूनानी सेवाओं को नई मेरिट सूची तैयार कर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए। इसके बाद सात नवंबर 2012 को नियुक्ति/पुनर्नियुक्ति आदेश जारी हुआ। आदेश में आठ अभ्यर्थियों को आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ज्वाइन करने को कहा गया, जबकि अन्य 230 अभ्यर्थी पहले से विभाग में कार्यरत थे।
इसके बाद विभाग ने वरिष्ठता सूची तैयार की। आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार 10 सितंबर 2018 को अस्थायी वरिष्ठता सूची जारी की गई और आपत्तियां मांगी गईं। अंतिम वरिष्ठता सूची पांच मार्च 2019 को जारी हुई। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि सूची में पांच मार्च 2018 अंकित होना टाइपिंग संबंधी त्रुटि थी और सही तारीख पांच मार्च 2019 थी।
इस वरिष्ठता सूची को लेकर संबंधित कर्मचारियों ने उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण का रुख किया। अधिकरण ने तीन मई 2021 को वरिष्ठता सूची निरस्त करते हुए तीन माह के भीतर नई वरिष्ठता सूची तैयार करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि तीन अगस्त 2012 का पूर्व आदेश चार सितंबर 2012 के विशेष अपील के फैसले के बाद अंतिम हो चुका था। जिन अभ्यर्थियों को अपनी नियुक्ति मूल तारीख से प्रभावी कराने के लिए कानून का सहारा लेने की स्वतंत्रता दी गई थी, उन्होंने उसका इस्तेमाल नहीं किया। उनकी नियुक्ति भी वर्ष 2009 से प्रभावी नहीं की गई थी। ऐसे में उन्हें वर्ष 2009 से नियुक्त मानकर वरिष्ठता देना उचित नहीं था।
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