अगरतला , जून 16 -- त्रिपुरा में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की सहयोगी टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मन ने स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) में ग्राम परिषद के चुनाव कराने में एक दशक से हो रही देरी की कड़ी आलोचना करते हुए उच्चतम न्यायालय से दखल की मांग की है।

श्री देबबर्मन ने मंगलवार को कहा कि जब आदिवासी ग्राम परिषद को इतने लंबे समय तक उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से दूर रखा जाता है, तो लोकतंत्र और "वन नेशन, वन इलेक्शन" जैसी पहल पर चर्चा करना विरोधाभासी हो जाता है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय में चल रही कानूनी कार्रवाई में अच्छे नतीजे की उम्मीद जताते हुए कहा कि उन्हें भरोसा है कि न्यायालय गांव की समितियों के लिए लंबे समय से रुके हुए चुनावों को अनिवार्य बनाकर न्याय करेगा, जिससे आदिवासी समुदायों के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल होंगे।

उन्होंने कहा, "पिछले दस सालों से गांवों में चुनाव नहीं हुए हैं, जो बहुत बुरा है। जहां राष्ट्रीय बहसें लोकतांत्रिक सिद्धांतों और चुनाव सुधारों का जश्न मनाती हैं, वहीं आदिवासी समुदायों के ज़मीनी अधिकारों को लगातार नज़रअंदाज़ किया गया है।" उन्होंने कहा कि इस कानूनी लड़ाई के लिए उनका प्रतिबद्वता निजी ज़िम्मेदारी से आता है, न कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा से। उन्होंने इन संवैधानिक अधिकारों के लिए चल रही लड़ाई को निजी वित्त पोषित किया है, जिसे वह अपने समुदाय के लिए ज़रूरी मानते हैं।

टिपरा नेता ने बताया कि पिछले दो सालों में, उन्होंने अपने लोगों को संविधान के तहत उनके हक दिलाने के लिए अपने संसाधन लगाये हैं। उन्होंने कहा कि उनका ध्यान पार्टी राजनीति पर नहीं, बल्कि त्रिपुरा के लोगों के लिए न्याय दिलाने पर है।

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