बैतूल , मई 15 -- मध्यप्रदेश में बैतूल जिले के आमला स्थित जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने पूर्व वैवाहिक स्थिति छिपाकर किए गए विवाह को अमान्य घोषित करते हुए वर्ष 2015 में संपन्न विवाह को शून्य करार दिया है। न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 11 के तहत दिए गए आदेश में कहा कि संबंधित विवाह अधिनियम की धारा 5 के प्रावधानों के विपरीत था।
प्रकरण के अनुसार आमला निवासी एक युवक ने न्यायालय में याचिका दायर कर बताया था कि उसका विवाह 13 अगस्त 2015 को छिंदवाड़ा निवासी युवती के साथ हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। विवाह के बाद उसे जानकारी मिली कि पत्नी का पहला विवाह वर्ष 2011 में हो चुका था और उस विवाह का विधिवत तलाक नहीं हुआ था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि विवाह से पूर्व यह तथ्य उससे जानबूझकर छिपाया गया। उसने यह भी कहा कि विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच लगातार विवाद होते रहे तथा महिला ने दहेज प्रताड़ना और भरण-पोषण संबंधी मामले भी दर्ज कराए।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेंद्र उपाध्याय ने दस्तावेज, गवाहों के बयान और शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किए। सुनवाई के दौरान महिला पक्ष ने दावा किया कि पूर्व विवाह समाप्त हो चुका था, लेकिन इसके समर्थन में कोई वैधानिक तलाक डिक्री प्रस्तुत नहीं की जा सकी।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि केवल नोटरी के समक्ष प्रस्तुत शपथ पत्र के आधार पर हिंदू विवाह का विधिक रूप से समाप्त होना सिद्ध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्षम न्यायालय द्वारा विधिवत तलाक की डिक्री जारी होने तक पूर्व विवाह वैध माना जाएगा। इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने 13 अगस्त 2015 को संपन्न विवाह को शून्य एवं अमान्य घोषित कर दिया। दंपती के आठ वर्षीय पुत्र की अभिरक्षा से संबंधित मामला अलग से न्यायालय में विचाराधीन है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित