हर्ष कक्कड़ सेनयी दिल्ली , मार्च 10 -- अफगानिस्तान के साथ अपनी वर्तमान उलझन के लिए पाकिस्तान काफी हद तक खुद ही जिम्मेदार है। जब दुनिया को अमेरिका और इज़रायल की ईरान के खिलाफ कार्रवाई का अंदेशा था और संभावित सैन्य हमले के लिए दूसरे कैरियर समूह की तैनाती की तैयारी चल रही थी, तभी पाकिस्तान के फील्ड मार्शल ने यह मान लिया कि अफगानिस्तान को सबक सिखाने का यही सही समय है।

उन्होंने अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' शुरू किए जाने से दो दिन पहले अफगानिस्तान में हवाई हमले का आदेश दे दिया। अफगानिस्तान के पाकिस्तान की शर्तें मानने से इनकार करने के कारण युद्ध के जल्द समाप्त होने की संभावना बेहद कम है।

अक्टूबर 2025 में पाक-अफगान के बीच संघर्ष में मध्यस्थता करने वाले अरब देश इस बार ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि वे खुद ईरान के हमलों का सामना कर रहे हैं। तुर्की में पिछले साल दिसंबर में हुई वार्ता के बाद बढ़ाए गए संघर्ष विराम को पाकिस्तान ने ही तोड़ा था। उसके हवाई हमलों में अफगानिस्तान के कई शहरों में नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया, जिससे कई निर्दोष लोगों की मौत हुई।

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन और संयुक्त राष्ट्र प्रवासी उच्चायोग के अनुसार, जारी संघर्ष के कारण 70,000 से अधिक अफगान नागरिक विस्थापित हो चुके हैं।

डूरंड रेखा के आसपास युद्ध जारी है। अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई करते हुए ड्रोन हमले शुरू कर दिए हैं, जिनमें पाकिस्तान के महत्वपूर्ण नूर खान एयरबेस को भी निशाना बनाया गया। इसी के साथ तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूच स्वतंत्रता समर्थक समूहों द्वारा पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमले जारी हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों ही एक-दूसरे को भारी नुकसान पहुंचाने के दावे कर रहे हैं, हालांकि इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

अमेरिका द्वारा शुरू किए गए 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' का असर पाकिस्तान पर भी पड़ा है। यह पहले से अनुमान था कि ईरान अपने सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली ख़ामेनेई की हत्या का जवाब जरूर देगा। चूंकि वह अमेरिका पर सीधा हमला नहीं कर सकता, इसलिए पश्चिम एशिया में स्थित अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के सैन्य ठिकाने उसके निशाने पर आए।

ईरान की ताकत उसके ड्रोन और मिसाइल हैं, जिनका उसने व्यापक इस्तेमाल किया। इसके अलावा, ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करने की आशंका भी जतायी गयी थी, जिससे वैश्विक समुद्री व्यापार, विशेषकर तेल आपूर्ति, प्रभावित हुई। युद्ध के कारण कई जहाज समुद्र में फंसे हुए हैं। ईरान ने जलडमरूमध्य को आंशिक रूप से खोलने की घोषणा तो की है, लेकिन जहाजों की आवाजाही अभी शुरू नहीं हो पाई है।

इस स्थिति के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और एलएनजी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। कई देशों ने अपने तेल आयात के विकल्पों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है। हालांकि, सऊदी अरब की आर्थिक सहायता पर निर्भर पाकिस्तान पर इसका सबसे अधिक असर पड़ा है। हालात संभालने के लिए इस्लामाबाद ने पेट्रोल और डीजल के दामों में 55 रुपये प्रति लीटर तक की वृद्धि कर दी है, जिससे जनता में आक्रोश बढ़ गया है। कई पेट्रोल पंपों पर ईंधन की कमी भी देखी जा रही है। तेल की कमी पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई की क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।

इस बीच सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता भी पाकिस्तान के लिए चुनौती बनता दिख रहा है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को रियाद बुलाया गया, जहां उन्होंने सऊदी रक्षा मंत्री से मुलाकात की। बताया जा रहा है कि यदि ईरान या उसके सहयोगी समूहों द्वारा हमले जारी रहते हैं, तो सऊदी अरब ने पाकिस्तान से अमेरिका के समर्थन में संघर्ष में शामिल होने की अपेक्षा जताई है। ऐसे में पाकिस्तान के सामने एक और मोर्चा खुल सकता है।

यदि पाकिस्तान ईरान के खिलाफ कोई कार्रवाई करता है तो उसे मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ सकता है। वह अभी तक भारत की ओर से चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' से हुए नुकसान से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया है और उसकी अर्थव्यवस्था नई क्षति सहने की स्थिति में नहीं है।

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु का असर पाकिस्तान के भीतर भी देखने को मिला। लाहौर, रावलपिंडी और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन हुए। लाहौर में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर बढ़ने की कोशिश की, जहां सुरक्षा बलों और अमेरिकी मरीन द्वारा गोलीबारी की गयी।

इसके विपरीत भारत में जम्मू-कश्मीर और अन्य हिस्सों में हजारों लोगों ने खामेनेई की मौत पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए और कहीं भी हिंसा की घटना नहीं हुई।

शिया-बहुल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने गोलीबारी कर दी, जिसमें 30 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है। इसके बाद क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया और मीडिया पर पाबंदी लगा दी गयी। कई दिनों से वहां खाद्य सामग्री और दवाओं की आपूर्ति भी बाधित बताई जा रही है।

इसी दौरान जम्मू-कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों में घुसपैठ की कोशिशों की भी खबरें हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान ने पिछले वर्ष भारत द्वारा पहुंचाए गए नुकसान की कुछ भरपाई कर ली है। ऐसे में भारत को पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की आवश्यकता है।

भारत को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे शिया नागरिकों की हत्या का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहिए और वहां के लोगों के लिए खाद्य सामग्री व चिकित्सीय सहायता भेजने की मांग करनी चाहिए।

इसके साथ ही नियंत्रण रेखा पर हर घुसपैठ की कोशिश का जवाब कड़े सैन्य कदमों से दिया जाना चाहिए, ताकि पाकिस्तान को अपनी पश्चिमी सीमा से सैनिक हटाकर यहां तैनात करने पर मजबूर होना पड़े।

भारत को यह भी स्पष्ट चेतावनी देनी चाहिए कि किसी भी आतंकवादी हमले या घुसपैठ की कोशिश का जवाब 'ऑपरेशन सिंदूर' को फिर से शुरू करके दिया जाएगा।

भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार और संसाधन हैं, जबकि पाकिस्तान कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। पाकिस्तान का परमाणु हथियारों का डर अब उतना प्रभावी नहीं रहा है। इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने हमेशा भारत के धैर्य का फायदा उठाया है, लेकिन अब समय है कि भारत पाकिस्तान की वर्तमान परिस्थितियों का लाभ उठाए।

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