बर्धमान , अगस्त 11 -- अपनी भाषाई एवं सांस्कृतिक पहचान के कमजोर होने और पारंपरिक व्यवसायों के पतन से चिंतित बंगाल के एक आदिवासी समुदाय 'महाली' ने आधिकारिक रिकॉर्ड में संथाल आदिवासियों से एक अलग पहचान स्थापित करने के प्रयास तेज कर दिये हैं।

समुदाय के नेताओं का कहना है कि आधिकारिक दस्तावेजों में महालियों को संथाल के रूप में दर्ज किया गया है। उनका दावा है कि यह भ्रम स्वतंत्रता पूर्व के दौर से चला आ रहा है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से मुर्मू, टुडू, मरांडी, बेसरा जैसी कई ऐसी सामान्य उपनामों को साझा करता है जो ज्यादातर संथाल जनजाति से जुड़े हैं। महाली पुनर्जागरण के नेताओं का अनुमान है कि यही इस बड़ी गड़बड़ी की मूल जड़ थी।

महाली आदिवासी कल्याण सोसाइटी के सचिव डॉ. कलचंद महाली ने बताया कि इसके अलावा, 'व्हाट्सएप के इस दौर में विलुप्त होने का खतरा और अधिक तीव्र हो गया है क्योंकि इसकी आबादी, भाषा और सदियों पुराने शिल्प तेजी से गायब होने लगे हैं।'कल्याणी विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर कलचंद बोलपुर के पास सियां गांव में स्थापित उस स्कूल के मुख्य संरक्षक हैं, जहां विभिन्न आयु वर्ग के स्थानीय बच्चों को महाली भाषा सिखायी जाती है।

प्रो कलचंद ने कहा , "शुरुआत में हमारे पास दो शिक्षक थे, लेकिन वित्तीय बाधाओं के कारण हम केवल 43 छात्रों को पढ़ाने के लिए एकमात्र शिक्षक का ही खर्च उठा सके।"डॉ. कलचंद ने महाली भाषा में 'बाबेर' (रस्सी), 'महाली आरोंग लोर्मी' (शुरुआती लोगों के लिए महाली भाषा की पुस्तिका) जैसी एक दर्जन किताबें लिखी हैं। उन्होंने 'खांचा चेंरे' (एक पिंजरा बंद पक्षी) शीर्षक से 22 मिनट की एक महाली फिल्म बनायी है, जिसे 2013 में जमशेदपुर में अखिल भारतीय संथाली फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित किया गया था और पुरस्कृत किया गया था।

इसके अलावा मान्यता की मांग के अपने कदम के तहत समुदाय ने 'पश्चिम बंगाल आदिवासी महाली समाज' नामक एक बड़ा मंच स्थापित किया है, जिसने कल बर्धमान में अपना पहला सम्मेलन आयोजित किया।

बंगाल के अल्पसंख्यक विकास मंत्री खुदीराम टुडू ने भी इस पर चिंता व्यक्त की और कहा , "यह एक तथ्य है कि इस समुदाय को सरकारी रिकॉर्ड में भी संथालों के साथ मिला दिया गया है। इसे सुधारने की जरूरत है क्योंकि वे एक अलग पहचान के हकदार हैं। यह गलतफहमी संभवतः इसलिए पैदा होती है क्योंकि महाली लोग संथाल बस्तियों के बगल में रहते हैं।"पश्चिम बंगाल आदिवासी महाली समाज की बैठक में समुदाय की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता सामने आयीई। बैठक की शुरुआत महाली गीतों के साथ हुई, लेकिन वक्ताओं ने कहा कि राज्य में महाली समुदाय की आबादी और उसकी सांस्कृतिक पहचान लगातार सिमट रही है।

संगठन के अनुसार, राज्य में अब करीब एक लाख महाली परिवार रह गये हैं। इनकी प्रमुख आबादी पूर्वी और पश्चिमी बर्धमान, बांकुड़ा, पुरुलिया, बीरभूम, झारग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों में है। पूर्वी बर्धमान, जो कभी महाली समुदाय का मजबूत गढ़ माना जाता था, अब वहां करीब 400 परिवार ही बचे हैं। इनमें से लगभग 300 परिवार जिले के एकमात्र 'महालीपाड़ा' इलाके में रहते हैं।

संगठन के राज्य सचिव उत्पल बेसरा ने कहा कि समुदाय की पारंपरिक आजीविका भी संकट में है। उन्होंने कहा, "बांस और बेंत का काम हमारी पहचान था। आज सस्ते प्लास्टिक के सामान ने बाजार को काफी हद तक खत्म कर दिया है, जिसका सीधा असर हमारे कारीगरों पर पड़ा है।"संगठन के सदस्यों के अनुसार समुदाय की सांस्कृतिक परंपराओं पर भी आधुनिक जीवनशैली का असर पड़ रहा है। शादियों और त्योहारों में पारंपरिक वाद्ययंत्र धामसा और मादल की जगह अब डीजे संगीत ले रहा है।

महाली युवा मोर्चा के राज्य सचिव रबिन महाली ने कहा कि रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में युवा अपने पैतृक गांवों से बाहर जा रहे हैं और मुख्यधारा के बंगाली समाज में घुल-मिल रहे हैं। इससे महाली भाषा बोलने वालों की संख्या घट रही है और पारंपरिक रीति-रिवाजों के संरक्षण को भी चुनौती मिल रही है।

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