कोलकाता , सितंबर 10 -- पश्चिम बंगाल में विपक्ष ने चेतावनी दी है कि राज्य के विश्वविद्यालयों के शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के तबादला संबंधी प्रावधान का गलत इस्तेमाल करके चुनिंदा शिक्षकों को निशाना बनाया जा सकता है और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर किया जा सकता है।
विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान उच्च शिक्षा मंत्री जगन्नाथ चट्टोपाध्याय द्वारा पेश किए गए 'पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय और कॉलेज (प्रशासन और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' का मकसद 2017 के कानून में संशोधन करना है। इसके तहत कुलाधिपति को राज्य सरकार के साथ सलाह-मशविरा करके 'प्रशासनिक कारणों' से कर्मचारियों के तबादले करने का अधिकार दिया जायेगा। विपक्ष के नेता रिताब्रता बनर्जी (तृणमूल कांग्रेस के उनके गुट से) ने विधेयक पेश करने के तरीके और तबादले के आधार के तौर पर 'प्रशासनिक कारणों' के साथ-साथ 'शैक्षणिक कारणों' का जिक्र न होने पर सवाल उठाये।
श्री बनर्जी ने कहा, "मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि आप इस बात पर विचार करें कि क्या इस पर चर्चा शुरू करना प्रक्रिया के हिसाब से सही है, जबकि इसकी प्रतियां (कॉपी) केवल सुबह 10:30 बजे ही बांटी गई थीं।" उन्होंने प्रस्तावित प्रावधान की शब्दावली पर सवाल उठाते हुए कहा, "प्रशासनिक कारणों के साथ-साथ 'शैक्षणिक कारणों' शब्द को क्यों शामिल नहीं किया गया है?" श्री बनर्जी ने राजनीतिक विरोधियों को चुनिंदा रूप से निशाना बनाये जाने की संभावना के बारे में भी आगाह किया और कहा कि अगर इसे चुनिंदा तरीके से लागू किया गया तो यह प्रावधान समस्याग्रस्त हो सकता है। उन्होंने कहा, "समस्या यह है कि क्या इस विधेयक से राजनीतिक विरोधियों को चुनिंदा रूप से निशाना बनाया जा सकता है। अगर चुनिंदा तरीके से निशाना बनाया जाता है, तो ऐसे मामले भी हो सकते हैं जहां कोई व्यक्ति किसी खास राजनीतिक नेता का समर्थक या सहयोगी हो।"मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के मुस्तफिजुर रहमान ने इस संशोधन को 'बुरी चेतावनी' बताया और आरोप लगाया कि इससे विश्वविद्यालयों की आजाद और स्वायत्त पहचान कमजोर हो सकती है। उन्होंने बताया कि नौकरी की शर्तें अलग-अलग विश्वविद्यालयों के नियमों और कानूनों से तय होती हैं, जबकि कई संस्थानों में शिक्षकों के तबादले का कोई प्रावधान नहीं है। श्री मुस्तफिजुर ने सवाल उठाया कि जिन शिक्षकों ने यह जानकर विश्वविद्यालयों में नौकरी शुरू की थी कि तबादले का कोई प्रावधान नहीं है, क्या बाद में कानून में संशोधन करके उनकी नौकरी की शर्तें बदली जा सकती हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि शोध परियोजना के बीच में प्राध्यापक का तबादला करने से उनकी देखरेख में काम कर रहे शोधाथियों का काम बाधित हो सकता है। माकपा विधायक ने सवाल किया कि क्या प्रस्तावित व्यवस्था सिंडिकेट और कार्यकारी परिषद जैसी वैधानिक संस्थाओं को दरकिनार कर सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के ढांचे के बाहर से लिए गये तबादले के फैसले संस्थान की स्वायत्तता के लिए खतरा बन सकते हैं।
तृणमूल कांग्रेस की अलीफा अहमद ने कहा कि इस विधेयक का असर सिर्फ प्रशासन तक सीमित नहीं है बल्कि यह उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और छात्रों के भविष्य पर भी असर डालेगा। उन्होंने सवाल किया कि संशोधन पेश करने से पहले शिक्षक संगठनों, कुलपतियों, शिक्षाविदों और विश्वविद्यालय की सीनेट और सिंडिकेट संस्थाओं के सदस्यों से सलाह क्यों नहीं ली गयी।
सुश्री अलीफा ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि 'प्रशासनिक जरूरत' का क्या मतलब होगा और क्या तबादले का आदेश देने से पहले पारिवारिक हालात, जिसमें 'पारिवारिक कठिनाइयां' भी शामिल हैं, पर विचार किया जायेगा। उन्होंने सुरक्षा उपायों की मांग की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अगर कोई प्राध्यापक सरकार के किसी फैसले की आलोचना करता है या प्रशासनिक गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाता है, तो बाद में उसका प्रशासनिक जरूरत के नाम पर तबादला न किया जाये। उन्होंने इसके साथ ही बेहतर शैक्षणिक आदान-प्रदान की जरूरत को माना और विकल्प के तौर पर संकाय आदान-प्रदान कार्यक्रम, अतिथि संकाय व्यवस्था, संयुक्त शैक्षणिक कार्यक्रम और मिलकर शोध करने जैसे सुझाव दिये।
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