कोलकाता , जून 29 -- पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण ढांचे को संशोधित और पुनर्गठित करने के लिए दो महत्वपूर्ण विधेयक पारित किए हैं, जिनका मकसद राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग की शक्तियों को मजबूत करना है।
गौरतलब है कि ये दो विधेयक - 'पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2026' और 'पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026' - विधानसभा में पेश किए गए और मत विभाजन के बाद पारित किये गये।
पहला विधेयक तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार के ओबीसी आरक्षण से जुड़े 2012 के कानून में संशोधन करता है, जबकि दूसरा विधेयक पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग से जुड़े 1993 के कानून में बदलाव करता है। पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरी शंकर घोष ने सदन में विधेयक पेश करते हुए कहा कि सरकार कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार काम कर रही है और उन्होंने इसके किसी भी राजनीतिक मकसद से इनकार किया।
श्री घोष ने विधानसभा को बताया, "हमने उन 113 वर्गों को हटा दिया है जिन्हें पहले बिना किसी क्षेत्र सर्वेक्षण के शामिल किया गया था और उन 66 समुदायों को बनाए रखा है जिन्हें अलग-अलग सर्वेक्षण के बाद शामिल किया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार अब उन 113 समुदायों को हटा दिया गया है।"उन्होंने कहा, "आयोग जांच करेगा और अगर उसे लगता है कि किसी समुदाय को शामिल किया जाना चाहिए, तो वह सिफारिशें करेगा जिन पर सरकार विचार करेगी। पिछली सरकार ने आयोग को नजरंदाज किया था और इसीलिए उच्च न्यायालय ने उस प्रक्रिया को रद्द कर दिया था।" गौरतलब है कि श्री घोष 2012 के कानून के तहत अनुसूची एक में शामिल 113 समुदायों का जिक्र कर रहे थे- जिसमें कोटि ए के तहत 65 समुदाय और कोटि बी के तहत 78 समुदाय शामिल थे। नये विधेयक के अनुसार इन्हें कानून से हटा दिया जाएगा।
नये संशोधन के तहत राज्य सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग के साथ सलाह-मशविरा करके जांच और मूल्यांकन के जरिए पहचाने गए पिछड़ेपन के स्तर के आधार पर ओबीसी नागरिकों को अलग-अलग कोटि में बांटने का अधिकार होगा। सरकार के पास आयोग के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद ओबीसी समुदायों की अलग-अलग कोटियों के लिए आरक्षण का प्रतिशत तय करने का अधिकार भी होगा। इस विधेयक में जरूरत पड़ने पर आरक्षण कोटा बढ़ाने की गुंजाइश है, हालांकि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से अधिक नहीं हो सकता।
यह कानून आयोग के कामकाज से जुड़े बदलाव भी लाता है। आयोग के सदस्य अब पद संभालने की तारीख से तीन साल तक पद पर बने रहेंगे, जबकि सदस्य-सचिव का कार्यकाल सरकार तय करेगी। दूसरा संशोधन विधेयक पिछड़ा वर्ग आयोग की शक्तियों और जिम्मेदारियों का काफी विस्तार करता है और उन्हें स्पष्ट करता है।
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