कोलकाता , जुलाई 13 -- पश्चिम बंगाल के नये संगठित अपराध-विरोधी कानून को लागू करने का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को कहा कि राज्य में दशकों से चली आ रही राजनीतिक हिंसा और अपराध को रोकने के लिए यह कानून ज़रूरत था।
श्री अधिकारी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तीन राज्यसभा उम्मीदवारों के नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कहा, "34 साल तक बंगाल पर कम्युनिस्टों का और अगले 15 साल तक तृणमूल के गुंडों का शासन रहा। उन्हें काबू में करने के लिए यह कानून ज़रूरी था। हमने इसे विधानसभा में पारित किया और राज्यपाल ने इसे मंज़ूरी दे दी है।"गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में नया संगठित अपराध-विरोधी कानून औपचारिक रूप से लागू हो गया है। यह कानून पुलिस और ज़िला अधिकारियों को व्यापक अधिकार देता है, जिसमें एहतियातन हिरासत, आदतन अपराधियों को राज्य से बाहर निकालना और संगठित आपराधिक गतिविधियों से हासिल की गयी संपत्ति को ज़ब्त करना शामिल है। पश्चिम बंगाल सरकार का नया संगठित अपराध-विरोधी कानून सोमवार से लागू हो गया है, जो पुलिस और ज़िला अधिकारियों को व्यापक अधिकार देता है, जिसमें एक साल तक की एहतियातन हिरासत, आदतन अपराधियों को राज्य से बाहर निकालना और संगठित आपराधिक गतिविधियों से हासिल संपत्ति को ज़ब्त करना शामिल है।
श्री अधिकारी ने शुक्रवार को बारुईपुर के दौरे के दौरान इस कानून को लागू करने की घोषणा की थी।
सरकार के अनुसार राज्य की कानून-व्यवस्था मशीनरी को और मजबूत करने और संगठित अपराध और असामाजिक गतिविधियों के खिलाफ रोक लगाने के लिए यह कानून लागू किया गया है। आधिकारिक तौर पर 'पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण अधिनियम, 2026' नाम का यह कानून संगठित आपराधिक नेटवर्क और आदतन अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए पुलिस और नागरिक प्रशासन की शक्तियों को काफी बढ़ाता है। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधानों में से एक 'निवारक हिरासत' है।
नये कानून के तहत, अगर अधिकारी को लगता है कि को व्यक्ति सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा है या कोई बड़ा असामाजिक या संगठित आपराधिक अपराध करने की योजना बना रहा है, तो उसे बिना मुकदमे के 12 महीने तक हिरासत में रख सकता है। कानूनी विशेषज्ञों ने इस प्रावधान की तुलना केंद्र के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एसएसए) के तहत उपलब्ध प्रावधानों से की है। यह अधिनियम बाहर निकालने के आदेश भी पेश करता है, जिसके तहत जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त और उप महानिरीक्षक (डीआईजी) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी आदतन अपराधियों को किसी खास इलाके या पूरे जिले को एक साल तक के लिए छोड़ने का निर्देश दे सकते हैं, अगर उनकी मौजूदगी से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका हो।
यह कानून इसके दायरे में आने वाले सभी अपराधों को गैर-जमानती बनाता है। पुलिस को बिना वारंट के आरोपी व्यक्तियों को गिरफ्तार करने का अधिकार होगा, जिससे इस अधिनियम के तहत आरोपी लोगों के लिए जमानत पाना और मुश्किल हो जाएगा। एक और बड़ा प्रावधान सरकार को संगठित आपराधिक गतिविधियों (जिसमें गिरोह का संचालन करना और अन्य गैर-कानूनी काम शामिल हैं) के जरिए हासिल की गयी संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार देता है। यह कानून असामाजिक गतिविधियों और गुंडा की परिभाषा का भी विस्तार करता है। इस अधिनियम के तहत आने वाली गतिविधियों में गिरोह का संचालन, जबरन वसूली, जमीन और घरों पर जबरन कब्जा, नदियों से अवैध रेत खनन, गैर-कानूनी खनन गतिविधियां, जनता को डराना-धमकाना जिससे व्यापार या सामान्य जीवन में बाधा आए, बड़े साइबर अपराध और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी शामिल हैं।
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