मिदनापुर , जुलाई 05 -- पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में आजीविका के नए और बेहतर साधन तलाशने के बीच, पश्चिम मिदनापुर जिले के एक महिला कॉलेज ने छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पारंपरिक वन संपदा 'सबाई घास' का सहारा लिया है।
यहां के राजा नरेंद्रलाल खान महिला कॉलेज ने स्नातक छठे सेमेस्टर की 160 छात्राओं को सबाई घास से पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया है, ताकि उन्हें टिकाऊ स्वरोजगार से जोड़ा जा सके। इस प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं ने सबाई घास से रस्सियाँ, टेबल चटाई, फूलों की टोकरियाँ, पेन स्टैंड, गमले, टी कोस्टर, जग और सब्जियों की टोकरियाँ बनाना सीखा।
इस व्यावहारिक सत्र में अनुभवी कारीगरों ने छात्राओं को प्राकृतिक रेशे की बुनाई करने, उन्हें सही आकार देने की बारीकियाँ सिखायीं। छात्राओं ने खुद भी कई हस्तशिल्प डिजाइन किए, जिसमें सोमा मन्ना ने एक सजावटी पेन स्टैंड और बंगाली विभाग की अन्वेषा मिर्धा ने फूलों की एक खूबसूरत टोकरी तैयार की।
छात्राओं को प्रशिक्षण देने वाली नयाग्राम ब्लॉक के कुर्मीपाथर गाँव की अनुभवी कारीगर अनिंदिता पंडित ने प्रतिभागियों के उत्साह की सराहना करते हुए कहा कि छात्राओं ने बेहतरीन रचनात्मकता दिखायी और बहुत कम समय में तरह-तरह के उत्पाद बनाना सीख लिया।
कॉलेज की प्राचार्य स्वप्ना घोराई ने इस क्षेत्र में सबाई घास के सामाजिक-आर्थिक महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह घास बंजर और सूखा प्रभावित जमीन पर भी आसानी से उग जाती है। ग्रामीण परिवारों, खासकर महिलाओं की आजीविका में इसका बड़ा योगदान रहा है।
प्राचार्य ने कहा, "सबाई घास से जुड़े छोटे उद्योग महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाते हैं। इससे बुजुर्गों और अकुशल श्रमिकों को भी रोजगार मिलता है, जिससे ग्रामीण कुटीर उद्योग मजबूत होता है।" उन्होंने बताया कि रस्सी और हस्तशिल्प के अलावा इसका उपयोग कागज, लुगदी और 'बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग' सामग्री बनाने में भी होता है। खेती का मौसम न होने पर यह कमाई का एक बड़ा जरिया बनती है।
जंगल महल क्षेत्र में वन उत्पादों पर शोध करने वाले डॉ. प्रवात कुमार शिट ने इसके पर्यावरणीय फायदों के बारे में बताया कि सबाई घास की गहरी जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं और बंजर जमीन को सुधारने का काम करती हैं। बिना रसायनों के उगने वाली यह प्राकृतिक घास प्लास्टिक और सिंथेटिक सामानों का एक बेहतरीन विकल्प है, जो पर्यावरण को सुरक्षित रखने और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद करती है।
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