अलवर , मार्च 24 -- राजस्थान अलवर में रबी की फसलों में सर्वाधिक बोई जाने वाली सरसों के तेल के भावों पर खाड़ी युद्ध का भी असर पड़ रहा है।

हालत यह है कि किसान अपने खेतों से सीधा सरसों की फसल को मंडी तक ला रहा है क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाले तेल का आयात न के बराबर हो रहा है। इसलिए सरसों के तेल की मांग लगातार बनी हुई है। किसानों को सरसों के भाव अच्छे मिलने से वह काफी खुश नजर आ रहे हैं। इस समय समर्थन मूल्य पर ही सरसों 6200 प्रति क्विंटल के भाव बिक रही है । जबकि खुले में भाव इससे ज्यादा हैं और इस बार पैदावार भी बहुत अच्छी है।

राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल ( जलालपुरिया) ने मंगलवार को बताया कि खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध के कारण वहां से तेल का आयात नहीं होने से किसानों की सरसों की फसल महंगी दामों में बिक रही है। तेल मिलों को भी इसका फायदा मिल रहा है। क्योंकि भारत में ही सबसे ज्यादा सरसों के तेल की खपत है। ऐसे में किसानों और व्यापारियों को काफी फायदा हो रहा है।

उन्होंने बताया कि इस बार अलवर भरतपुर जिले में सरसों उत्पादन के क्षेत्र में सबसे बड़े जिले हैं, इस बार सरसों की पैदावार भी अच्छी हुई है। पैदावार के साथ-साथ इस बार सरसों उत्तम गुणवत्ता की भी है, जिसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा हुई है। जानकारों ने बताया कि सरसों में औसतन 40 प्रतिशत तेल निकलता है, लेकिन इस बार 43 प्रतिशत तक सरसों में तेल निकल रहा है । मतलब 100 किलो में 43 किलो तेल। किसानों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है। सरसों की आवक कृषि उपज मंडी में लगातार हो रही है। 35 से 40 हजार कट्टे प्रतिदिन सरसों आ रही है।

श्री अग्रवाल ने बताया कि मलेशिया से पाम ऑयल आता है। जबकि अमरीका से सोयाबीन रिफाइंड आता है। इसी से ही पूर्ति होती थी, क्योंकि भारत का तेल खाद्यान्न उद्योग 55 फ़ीसदी विदेश पर निर्भर है। देश में 45 फीसदी तेल खाद्यान्न पैदा होता है। हालांकि इस वक्त तीनों के भाव बराबर होने से मिलावट के आसार नहीं है, क्योंकि भाव में अंतर होने के कारण सरसों के तेल में अन्य तेलों की मिलावट होने की संभावना रहती है। खाद्यान्न तेल के मिलावट पर सरकार की भी कोई रोक नहीं है इसलिए बाजार में वह आसानी से बिक जाता है।

उन्होंने बताया कि इस बार वहां से तेल नहीं आने से इस बार भारत में सरसों के तेल की जबरदस्त मांग बनी हुई है और किसान भी इसी कारण अपनी सरसों को लगातार बेच रहा है। क्योंकि इस समय सरसों के भाव 6800 तक पहुंच गए हैं । किसानों का मानना है कि अगर खाड़ी देशों से तेल आयात हो गया तो निश्चित रूप से तेल की सरसों की मांग इतनी नहीं रहेगी और भाव गिर सकते हैं ।

पिछले वर्ष देश में सरसों का उत्पादन 117 लाख टन था। इस बार 111 लाख टन होने की उम्मीद है, लेकिन इस बार सरसों में दो प्रतिशत तेल अधिक मात्रा होने की उम्मीद है जिससे तेल ज्यादा निकलेगा।

उन्होंने कहा कि अगर खाड़ी देशों का युद्ध थोड़ा लंबा चला तो भारत में सरसों के भाव बढ़ सकते हैं। अभी तो जमाखोरी के कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि सरकार की ओर से काफी पाबंदी है । वायदा व्यापार पर दो वर्ष से रोक है जिससे सरसों के कारोबार में सटोरियों का सिस्टम बंद है।

श्री अग्रवाल ने बताया कि विदेशी तेल भारत में आने से हमेशा 10 लाख टन सरसों का स्टॉक रहता था, लेकिन युद्ध के चलते 10 लाख टन का स्टॉक खत्म होने के आसार हैं। उन्होंने बताया कि डॉलर में तेजी होने के कारण भी विदेशी तेल इस वक्त महंगा आ रहा है। युद्ध लंबा खिंचने से आम जनता को इसका नुकसान हो सकता है।

सरकार लगातार सरसों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाती जा रही है। इसके पीछे सबसे मुख्य कारण यह है कि किसानों को प्रोत्साहन मिले और वह तिलहन बोए जिसमें सबसे ज्यादा सोयाबीन और सरसों की बुवाई की जाए।

अलवर से सरसों के तेल की सबसे ज्यादा खपत बंगाल असम और बिहार में होती है। अलवर में इसलिए सरसों तेल उत्पादन का सबसे बड़ा हब बना हुआ है। अलवर में सात बड़े सॉल्वेक्स संयंत्र लगे हुए हैं और करीब 80 मिल लगी हैं जो सरसों के तेल के लिए काम कर रही हैं।

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