हमीरपुर , अप्रैल 27 -- उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में पांच वर्ष बाद संपन्न हुई 21वीं पशुगणना में पशुओं की संख्या बढ़ने के बजाय करीब ढाई लाख कम हो गई है, जिनमें 38 हजार से अधिक गौवंश शामिल हैं। पशुओं की लगातार घटती संख्या से खेती पर पड़ रहे अप्रत्यक्ष प्रभाव को लेकर पशुपालन विभाग चिंतित है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (सीवीओ) डॉ. भूपेंद्र यादव ने सोमवार को बताया कि पहले पशुगणना प्रत्येक दस वर्ष में होती थी, लेकिन बाद में शासन ने इसे हर पांच वर्ष में कराने का प्रावधान कर दिया। इस माह संपन्न 21वीं पशुगणना में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

उन्होंने बताया कि पिछली पशुगणना में जिले में कुल पशुओं की संख्या 7,68,433 थी, जो अब घटकर 5,30,893 रह गई है। इसी प्रकार पिछली गणना में गौवंशों की संख्या 1,41,151 थी, जो इस बार घटकर 1,03,796 रह गई। यानी लगभग 38 हजार गौवंश कम हुए हैं।

पशुपालन विभाग का कहना है कि पिछले कई वर्षों से गौवंश संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, इसके बावजूद संख्या में वृद्धि के बजाय गिरावट दर्ज होना चिंता का विषय है।

महिषवंशीय पशुओं की संख्या भी घटकर 2,38,510 से 1,74,591 रह गई है। वहीं बकरी, भेड़, घोड़ा और अन्य पशुओं की संख्या में भी लगातार कमी दर्ज की गई है। सीवीओ ने बताया कि मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण किसान अब पशुपालन के बजाय ट्रैक्टर और अन्य कृषि उपकरणों से खेती करना अधिक सुविधाजनक मान रहे हैं, जिससे पशुओं की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है।

उन्होंने बताया कि सरीला ग्रामीण क्षेत्र, मौदहा शहरी क्षेत्र और हमीरपुर नगर में सबसे कम गौवंश पाए गए हैं। शासन द्वारा गौवंश पालन के लिए प्रोत्साहन दिए जाने के बावजूद किसानों की रुचि इस ओर कम होती जा रही है। इसी प्रकार पिछली पशुगणना में जिले में बकरियों की संख्या करीब तीन लाख थी, जो अब घटकर 2,40,392 रह गई है। जबकि कृषि विभाग और भूमि संरक्षण विभाग द्वारा बकरी पालन योजना संचालित की जाती है, जिसमें हर वर्ष किसानों को लाखों रुपये का अनुदान दिया जाता है। इसके बावजूद बकरी पालन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही।

कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पशुओं की संख्या लगातार घटती रही तो इसका सीधा प्रभाव खेती पर पड़ेगा। गोबर खाद के अभाव में खेतों की उर्वरता घटेगी और जमीन बंजर होने की स्थिति तक पहुंच सकती है। मौदाहा, राठ और कुरारा क्षेत्र में इसका असर पिछले एक दशक से दिखाई देने लगा है। मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला के अनुसार यदि यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में जमीन की उपज आधी रह सकती है, जिसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा।

मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. भूपेंद्र यादव ने कहा कि पशुओं की संख्या बढ़ाने के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है और किसानों को पशुपालन के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

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