, Sept. 1 -- स्थानीय मान्यता के अनुसार अभिमंत्रित अक्षत से गांव की सीमा बांधी जाती है। बरना के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा पेड़-पौधे की पत्ती, घास या तिनका तोड़ने को सामुदायिक नियम का उल्लंघन माना जाता है। ऐसा करने पर 500 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।

बरना पर्व के दौरान लागू होने वाले नियम केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके केंद्र में पर्यावरण संरक्षण की स्पष्ट भावना दिखाई देती है। दो दिनों के लिए कृषि कार्य, श्रम और अनावश्यक आवागमन रोककर समुदाय प्रकृति को उसके स्वाभाविक रूप से विकसित होने का अवसर देता है। पश्चिम चंपारण का उत्तरी तराई क्षेत्र थारू समाज की प्रमुख सांस्कृतिक भूमि है, जिसे स्थानीय स्तर पर 'थारूहट' कहा जाता है।

वाल्मीकिनगर और इसके आसपास के जंगलों तथा गांवों में थारू समुदाय की जीवनशैली लंबे समय से वन और प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ी रही है। भारत सरकार ने थारू समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया है।

थारू समाज की अनेक पारंपरिक मान्यताओं में प्रकृति, जंगल, जल और वनस्पतियों के संरक्षण को विशेष महत्व दिया जाता है। बरना पर्व इसी पर्यावरणीय चेतना का एक जीवंत उदाहरण माना जाता है।

बरना पर्व की परंपरा देश की अन्य आदिवासी प्रकृति-केंद्रित परंपराओं से भी साम्य रखती है। झारखंड सहित कई क्षेत्रों में मनाए जाने वाले सरहुल पर्व के दौरान भी प्रकृति और वृक्षों की पूजा की जाती है तथा कुछ अवधि में खेतों में हल-कुदाल चलाने और वृक्षों को काटने या उनकी टहनियां तोड़ने पर रोक रहती है। इन परंपराओं में प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के आधार और आस्था के केंद्र के रूप में देखने की भारतीय आदिवासी दृष्टि दिखाई देती है।

बरना की 48 घंटे की अवधि पूरी होने के बाद पीपल के 'बरखाना' की पुनः पूजा की जाएगी। इसके बाद खर-पतवार हटाने और अन्य सामान्य कार्यों के साथ गांव की दिनचर्या बहाल होगी। पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के साथ पर्व का समापन किया जाएगा।

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