नयी दिल्ली , सितंबर 17 -- संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किये जाने के एक महीने से अधिक समय बाद भी उसका औपचारिक सत्रावसान नहीं हुआ है।
इस प्रक्रिया में इस "असामान्य" देरी ने राजनीतिक बहस और इस अटकल को जन्म दिया है कि नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विधायी कामकाज को पूरा करने के लिए संसद का "विशेष सत्र" बुलाया जा सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार इस महीने के अंत में संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है, जिसमें परिसीमन और महिला आरक्षण से संबंधित विधेयक पारित किये जा सकते हैं। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026 शामिल हैं, जो लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का ढांचा उपलब्ध कराता है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र ने त्योहारी मौसम से पहले विशेष सत्र बुलाने के प्रस्ताव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेताओं के साथ-साथ विपक्षी दलों से भी संपर्क किया है, हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गयी है।
सत्रावसान का अर्थ संसद के किसी सत्र की औपचारिक समाप्ति होता है। भारत में संसद का सत्रावसान राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। व्यवहार में राष्ट्रपति इस शक्ति का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर करते हैं।
संसद का सत्रावसान करना केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है, लेकिन इस देरी पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाये हैं। उनका आरोप है कि मोदी सरकार अपने संख्याबल को मजबूत करने और विवादास्पद परिसीमन विधेयक को फिर से पेश करने की तैयारी कर रही है, जिसे अप्रैल में विशेष सत्र के दौरान पराजित कर दिया गया था।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने हाल में कहा था कि राजग सरकार ने दोनों सदनों का सत्रावसान करने में सबसे अधिक देरी के अपने ही पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
सूत्रों ने कहा कि मानसून सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही बाधित रहने के बीच भाजपा द्वारा विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक, 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने का फैसला तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कषगम और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) जैसे विपक्षी दलों को साधने की कोशिश थी। ये दल मौजूदा स्वरूप में विधेयक के विरोध में थे, लेकिन कुछ शर्तों के साथ परिसीमन की प्रक्रिया के पक्ष में नजर आते हैं।
दरअसल, मोदी सरकार की योजनाओं की सफलता राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) और श्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) पर निर्भर करती है। बताया जाता है कि भाजपा को लोकसभा में द्रमुक के 22 सांसदों और राकांपा के आठ सांसदों का समर्थन पहले ही मिल चुका है। ऐसे में यदि ये दल परिसीमन संबंधी विधेयक पर मतदान के दौरान सरकार का समर्थन करते हैं या मतदान से अनुपस्थित रहते हैं, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए इसे पारित कराना काफी आसान हो सकता है।
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