बेंगलुरु , जून 02 -- कर्नाटक में कांग्रेस के बहुचर्चित नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही पार्टी के भीतर असंतोष के नये संकेत सामने आने लगे हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कथित तौर पर एक बार फिर मुख्यमंत्री पद के लिए नजरअंदाज किए जाने पर नाराजगी जतायी है।
इस घटनाक्रम ने कर्नाटक की राजनीति में एक पुराने सवाल को फिर से चर्चा में ला दिया है कि क्या श्री परमेश्वर की लंबे समय से चली आ रही मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा कभी पूरी हो पाएगी।
पार्टी सूत्रों के अनुसार वरिष्ठ दलित नेता परमेश्वर ने हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से अपनी नाराजगी व्यक्त की है और साथ ही विभाग परिवर्तन की मांग भी की है। बताया जाता है कि वह गृह विभाग की जिम्मेदारी जारी रखने के पक्ष में नहीं हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सत्ता संतुलन के समीकरणों को साधने के लिए आंतरिक स्तर पर चर्चा में रहे विधानसभा अध्यक्ष पद में भी उनकी विशेष रुचि नहीं है।
श्री परमेश्वर की कथित नाराजगी ऐसे समय सामने आई है जब कांग्रेस नेतृत्व डीके शिवकुमार को कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री घोषित करने के बाद मंत्रिमंडल गठन की जटिल प्रक्रिया से जूझ रहा है। नयी सरकार में मंत्रियों के चयन, उपमुख्यमंत्री पदों के बंटवारे और महत्वपूर्ण विभागों को लेकर विभिन्न गुटों एवं जातीय समूहों की ओर से जोरदार लॉबिंग जारी है।
कर्नाटक की राजनीति में प्रमुख दलित चेहरे के रूप में स्थापित श्री परमेश्वर ने कभी भी मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा को छिपाया नहीं है। उत्तराधिकार को लेकर लंबे समय तक चली चर्चा के दौरान भी उनका नाम प्रमुखता से सामने आया था, जिसका अंत अंततः श्री शिवकुमार द्वारा श्री सिद्दारमैया की जगह लेने के साथ हुआ। कई दलित नेताओं ने पहले यह तर्क दिया था कि यदि नेतृत्व परिवर्तन अपरिहार्य है तो कांग्रेस को किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर विचार करना चाहिये।
राजनीतिक हलकों में चर्चा को और बल इस बात से मिला है कि परमेश्वर का नाम उपमुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार उनके साथ श्री प्रियांक खरगे के नाम पर भी विचार किया जा रहा है, क्योंकि पार्टी नयी सरकार में क्षेत्रीय, जातीय और गुटीय संतुलन साधने का प्रयास कर रही है।
श्री सिद्दारमैया से श्री शिवकुमार तक सत्ता हस्तांतरण को लेकर उम्मीद थी कि इससे कई महीनों से जारी शक्ति-संतुलन की कवायद समाप्त हो जायेगी, लेकिन अब ध्यान पार्टी के भीतर विभिन्न महत्वाकांक्षाओं को समायोजित करने की उतनी ही संवेदनशील प्रक्रिया पर केंद्रित हो गया है। विभिन्न समुदायों से जुड़े वरिष्ठ नेता उपमुख्यमंत्री पद, प्रभावशाली मंत्रालयों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों की मांग कर रहे हैं, जिससे मंत्रिमंडल गठन एक नये शक्ति संघर्ष का मैदान बनता दिखाई दे रहा है।
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