पौड़ी/ऋषिकेश , अप्रैल 28 -- उत्तराखंड में देवभूमि ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में मंगलवार को स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं सुप्रसिद्ध गायक कैलाश खेर के मध्य गुरुकुल परंपरा, भजन और आध्यात्मिक संगीत को लेकर प्रेरणादायी संवाद का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, संस्कारों और सनातन चेतना को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि गुरुकुलों में भजन, कीर्तन और आध्यात्मिक संगीत के माध्यम से युवाओं को भारतीय मूल्यों से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गुरुकुल परंपरा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन निर्माण की दिव्य प्रक्रिया है, जिसमें अनुशासन, सेवा, साधना और संस्कारों का समावेश होता है। उन्होंने भजन और संगीत को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए कहा कि जब स्वरों में भक्ति जुड़ती है, तो वह साधना का रूप ले लेती है।
वहीं कैलाश खेर ने कहा कि भारत की भूमि में संगीत साधना का स्वरूप है। उन्होंने कहा कि भारतीय भजन परंपरा में आध्यात्मिकता और संवेदना का गहरा संबंध है, जो व्यक्ति और समाज दोनों को जोड़ता है।
संवाद के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि युवाओं को वेद मंत्रों, संत वाणी और शास्त्रीय संगीत से परिचित कराकर उनमें आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रप्रेम के संस्कार विकसित किए जा सकते हैं।
कार्यक्रम में यह निष्कर्ष निकला कि आधुनिक दौर में भक्ति, लोकधुनों और तकनीक का समन्वय कर भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है।
अंत में सभी ने यह संकल्प लिया कि भजन, योग, ध्यान और संस्कारों के माध्यम से समाज में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार किया जाएगा।
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