अजमेर , मई 10 -- राजस्थान के अजमेर में स्थित महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर सुरेश कुमार अग्रवाल ने भविष्य की पत्रकारिता को लेकर चुनौतियां और भी जटिल बताते हुए कहा हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डीपफेक तकनीक, वर्चुअल रियलिटी, डेटा एनालिटिक्स और रोबोटिक रिपोर्टिंग मीडिया की दुनिया को तेजी से बदल रहे हैं। ऐसेमें पत्रकारिता को केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि नैतिक विवेक से भी लैस होना होगा।

प्रोफेसर अग्रवाल ने रविवार को पत्रकारिता को लेकर यह बात कही। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में समाचार केवल पढ़े या सुने नहीं जाएंगे, बल्कि "अनुभव" किए जायेंगे। वर्चुअल रियलिटी ऐसी पत्रकारिता लेकर आएगी जहाँ दर्शक स्वयं को घटना-स्थल पर उपस्थित महसूस करेगा। लेकिन तकनीक जितनी शक्तिशाली होगी, नैतिक संकट भी उतने ही गहरे होंगे। डीपफेक तकनीक सत्य और असत्य के बीच की रेखा को धुंधला कर रही है।

उन्होंने कहा कि एआई आधारित लेखन मौलिकता और मानवीय संवेदना को चुनौती दे रहा है। डेटा नालिटिक्स जनमत को प्रभावित करने का नया माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में पत्रकारिता को केवल तकनीकी दक्षता से नहीं, बल्कि नैतिक विवेक से भी लैस होना होगा। यदि पत्रकारिता मानवीय संवेदना खो देगी, तो वह केवल सूचना उद्योग बनकर रह जाएगी।

विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकारिता की शिक्षा केवल रिपोर्टिंग तकनीकों तक सीमित नहीं रह सकती। भविष्य के पत्रकारों को भाषा, दर्शन, इतिहास, संस्कृति, संविधान, तकनीक और सामाजिक मनोविज्ञान सभी का गहरा बोध होना चाहिए। जो पत्रकार शब्दों के अर्थ और उनके प्रभाव को नहीं समझता, वह समाज को दिशा नहीं दे सकता।

प्रोफेसर अग्रवाल ने कहा कि भारत आज वैश्विक परिवर्तन के एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में पत्रकारिता को राष्ट्र और समाज के बीच एक जिम्मेदार सेतु बननाहोगा। उसे न तो सत्ता का उपकरण बनना चाहिए और न ही केवल विरोध का मंच। पत्रकारिता का वास्तविक दायित्व सत्य को समाज के समक्ष संतुलित और उत्तरदायी रूप में प्रस्तुत करना है। आने वाला समय निश्चित रूप से एआई, डिजिटल मीडिया और इमर्सिव जर्नलिज्म का होगा, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा वही रहेगी जो सदियों से रही है- सत्य, लोकहित और नैतिक साहस।

तकनीक पत्रकारिता के स्वरूप को बदल सकती है, लेकिन उसके मूल्यों का स्थान कभी नहीं ले सकती। यदि पत्रकारिता अपनी बौद्धिक ईमानदारी, संवेदनशीलता और रचनात्मक दृष्टि को पुनः स्थापित कर पाती है, तो वह भविष्य में भी लोकतंत्र की सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी रहेगी। लेकिन यदि वह केवल सनसनी, वैचारिक आग्रह और कृत्रिम आख्यानों तक सीमित रहगई, तो समाज का विश्वास खो देगी। आज आवश्यकता तेज़ पत्रकारिता की नहीं, बल्कि जिम्मेदार पत्रकारिता की है। ऐसी पत्रकारिता जो समाज को तोड़े नहीं, जोड़े; भ्रम नहीं, स्पष्टता दे और केवल प्रतिक्रिया नहीं, दिशा प्रदान करे।

उन्होंने इस तीव्र सूचना-युग में सबसे बड़ा संकट सत्य का बताते हुए कहा कि पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज स्वयं एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है जहां उसे यह तय करना है कि वह समाज को दिशा देगी या केवल प्रतिक्रियाओं का माध्यम बनकर रह जाएगी।

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