नयी दिल्ली , सितंबर 10 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए बच्चों के अपहरण मामलों से निपटने के लिए एक समान प्रणाली बनाने हेतु केंद्र, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत , न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर अधिकारियों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति मोहना ने सुनवाई के दौरान बताया कि सरकार ने बच्चों की सुरक्षा के लिए पहले ही कई पहल और योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें 'बेटी बचाओ' भी शामिल है और उच्चतम न्यायालय ने भी इस मुद्दे पर कई निर्देश जारी किये हैं। पीठ ने सवाल किया कि क्या जांच एजेंसियों को अपहरण के मामलों की जांच कैसे करनी चाहिए, इस बारे में और न्यायिक निर्देशों की जरूरत है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि पिछले कुछ सालों में मानव तस्करी शोषण के अलग-अलग रूपों में बदल गयी है और बच्चों की तस्करी के मामलो में काफी बढ़ोतरी हुई है, जिसमें हर साल दो लाख से अधिक बच्चे लापता हो जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों की तस्करी यौन शोषण, जबरिया मजदूरी, भीख मांगने, छोटे-मोटे अपराधों, बाल विवाह और बाल श्रम जैसे कामों के लिए की जा रही है। याचिका में अपहरण और अगवा करने के मामलों के लिए आम सवाल और खास जांच प्रक्रियाओं की मांग की गयी है और यह सुझाव दिया गया है कि ऐसी जांच एसीपी/एसएचओ के पद से नीचे के अधिकारी न करें।
याचिका में सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों से निपटने वाली विशेष अदालत की तर्ज पर अपहरण और अगवा करने के मामलों को एक साल के भीतर निपटाने के लिए खास अदालत बनाने की भी मांग की गयी है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्राथमिकी दर्ज करने और लापता बच्चों से जुड़ी शिकायतों की जांच में देरी से उन्हें ढूंढने में रुकावट आती है और वे तस्करी और शोषण के दूसरे रूपों के जोखिम में पड़ जाते हैं।
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